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Falguni Pathak: 25 रुपये से गरबा क्वीन बनने तक का सफर

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जानिए कैसे घर की छत पर गाने वाली लड़की बनीं नवरात्रि की पहचान

मृदुभाषी डिजिटल डेस्क। फाल्गुनी पाठक की सफलता की कहानी: ‘मैंने पायल है छनकाई’, ‘याद पिया की आने लगी’ और ‘चूड़ी जो खनके’ जैसे सुपरहिट गानों से लोगों के दिलों में जगह बनाने वाली फाल्गुनी पाठक आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। नवरात्रि आते ही उनके गानों की धूम शुरू हो जाती है और गरबा-डांडिया के मैदान उनकी आवाज से गूंजने लगते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज ‘गरबा क्वीन’ के नाम से मशहूर फाल्गुनी को अपने पहले कार्यक्रम के लिए महज 25 रुपये मिले थे? बचपन में घर की छत पर गाने से शुरू हुआ उनका सफर संगीत की दुनिया में एक अलग मुकाम तक पहुंचा। आइए जानते हैं फाल्गुनी पाठक के संघर्ष, करियर, सुपरहिट गानों और उनकी सफलता की पूरी कहानी।

Falguni Pathak Biography: बचपन से ही था संगीत का शौक

फाल्गुनी पाठक का जन्म वर्ष 1971 में मुंबई के खार इलाके में एक गुजराती परिवार में हुआ था। वह पांच बेटियों में सबसे छोटी थीं। उनके घर में संगीत का माहौल था और रेडियो पर पुराने हिंदी गाने सुनने को मिलते थे। उनकी एक बहन शास्त्रीय संगीत सीखती थीं। फाल्गुनी भी उनके पास बैठकर संगीत सुनतीं और धीरे-धीरे खुद गाने लगीं। फाल्गुनी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने संगीत की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली। पुराने हिंदी गानों को सुनकर उन्होंने गायकी सीखी और लगातार अभ्यास से अपनी आवाज को निखारा। उनकी गायकी का शुरुआती मंच उनके घर की छत थी। वह वहां गाने गाती थीं और पड़ोसी उनसे अपनी पसंद के गाने सुनाने की फरमाइश करते थे। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि घर की छत पर गाने वाली यह लड़की एक दिन देशभर में गरबा और डांडिया की पहचान बन जाएगी।

माता-पिता चाहते थे डॉक्टर या इंजीनियर बनें फाल्गुनी

फाल्गुनी पाठक के लिए संगीत को करियर बनाना आसान नहीं था। उनके माता-पिता चाहते थे कि वह पढ़-लिखकर डॉक्टर या इंजीनियर बनें। लेकिन फाल्गुनी का मन संगीत में लगता था। उस दौर में कम उम्र में किसी लड़की का मंच पर गाना और पेशेवर कार्यक्रमों में हिस्सा लेना परिवारों के लिए सहज फैसला नहीं होता था। इसके बावजूद फाल्गुनी ने संगीत के प्रति अपने लगाव को बनाए रखा। उनके जीवन की शुरुआती चुनौतियों ने उन्हें अपने जुनून के प्रति और मजबूत बनाया। उन्होंने धीरे-धीरे छोटे कार्यक्रमों में गाना शुरू किया और मंच पर अपनी पहचान बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए।

पहली परफॉर्मेंस के लिए मिले थे सिर्फ 25 रुपये

फाल्गुनी पाठक की जिंदगी का एक दिलचस्प किस्सा उनकी पहली कमाई से जुड़ा है। बताया जाता है कि जब वह महज नौ साल की थीं, तब उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के एक कार्यक्रम में फिल्म ‘कुर्बानी’ का लोकप्रिय गाना ‘लैला मैं लैला’ गाया था। इस प्रस्तुति के लिए उन्हें 25 रुपये मिले थे। फाल्गुनी ने ये रुपये अपनी मां को दे दिए। हालांकि, उनके पिता इस बात से खुश नहीं थे और उन्होंने नाराजगी भी जताई थी। लेकिन संगीत के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ। छोटी उम्र में मिली यह पहली कमाई उनके लिए एक यादगार अनुभव बनी। आगे चलकर यही शौक उनका पेशा और उनकी पहचान बन गया।

1989 में डांडिया ग्रुप से शुरू हुआ करियर

फाल्गुनी पाठक के करियर को आगे बढ़ाने में डांडिया संगीत की अहम भूमिका रही। वर्ष 1989 में उन्होंने ‘द बीटरज’ नाम के एक डांडिया ग्रुप के साथ काम करना शुरू किया। यहां उन्हें गरबा और डांडिया संगीत को करीब से समझने का मौका मिला। धीरे-धीरे नवरात्रि के कार्यक्रमों में उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। उन्होंने महसूस किया कि गुजराती लोकसंगीत और गरबा की धुनों के जरिए वह अपनी एक अलग पहचान बना सकती हैं। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपना म्यूजिक ग्रुप ‘ता थैया’ शुरू किया। इसके साथ उन्होंने विभिन्न कार्यक्रमों में प्रस्तुतियां देना शुरू किया। अपना ग्रुप शुरू करना उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव था। अब वह केवल गायिका नहीं थीं, बल्कि कार्यक्रमों की तैयारी, संगीतकारों के साथ तालमेल और दर्शकों की पसंद को समझने पर भी ध्यान देने लगीं। उनकी गायकी में गुजराती लोकधुनों और आधुनिक संगीत का मेल था। इस खास अंदाज ने उन्हें युवाओं के बीच भी लोकप्रिय बनाया। देखते ही देखते उनके कार्यक्रमों में दर्शकों की संख्या बढ़ने लगी और उनका नाम नवरात्रि के साथ जुड़ता चला गया।

‘याद पिया की आने लगी’ ने दिलाई देशभर में पहचान

फाल्गुनी पाठक को नवरात्रि के कार्यक्रमों से पहचान मिल रही थी, लेकिन उनके निजी म्यूजिक एल्बम के गानों ने उन्हें देशभर में लोकप्रिय बना दिया। वर्ष 1990 के दशक के आखिर में उनका गाना ‘याद पिया की आने लगी’ श्रोताओं के बीच खूब पसंद किया गया। इसकी धुन, गायकी और म्यूजिक वीडियो ने लोगों का ध्यान खींचा। इस गाने की लोकप्रियता ने फाल्गुनी को उन लोगों के बीच भी पहचान दिलाई, जिनका गरबा या डांडिया से सीधा जुड़ाव नहीं था। इसके बाद ‘मैंने पायल है छनकाई’ और ‘मेरी चुनर उड़ उड़ जाए’ जैसे गानों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। इन गानों में प्यार, इंतजार और जवानी से जुड़ी भावनाओं को सहज अंदाज में पेश किया गया था। यही वजह रही कि उनके गीत युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय हुए। उस दौर में निजी म्यूजिक एल्बम का चलन तेजी से बढ़ रहा था। फाल्गुनी पाठक ने इस दौर में अपनी अलग पहचान बनाई और इंडिपॉप संगीत की लोकप्रिय आवाजों में शामिल हो गईं।

कैसे बनीं फाल्गुनी पाठक ‘गरबा क्वीन’?

फाल्गुनी पाठक को ‘गरबा क्वीन’ बनाने में उनके लाइव शो की सबसे बड़ी भूमिका रही है। उनके कार्यक्रमों में लोग सिर्फ गाने सुनने नहीं, बल्कि गरबा और डांडिया खेलने के लिए भी पहुंचते हैं। उनके शो में गुजराती लोकधुनें, ढोल की थाप, संगीतकारों की टीम और दर्शकों के साथ उनका जुड़ाव एक अलग माहौल तैयार करते हैं। जब हजारों लोग एक साथ उनके गानों पर गरबा करते हैं, तो पूरा आयोजन उत्सव में बदल जाता है। फाल्गुनी पाठक की लोकप्रियता मुंबई से निकलकर गुजरात और देश के दूसरे शहरों तक पहुंची। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बीच भी उनके गरबा और डांडिया कार्यक्रम लोकप्रिय हुए। उनके संगीत ने नवरात्रि के पारंपरिक उत्सव को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। आज भी नवरात्रि के दौरान उनके पुराने गाने गरबा पंडालों और डांडिया आयोजनों में खूब सुनाई देते हैं।

नवरात्रि के कार्यक्रमों से होती है बड़ी कमाई

फाल्गुनी पाठक की लोकप्रियता का असर उनके लाइव कार्यक्रमों पर भी दिखाई देता है। नवरात्रि के दौरान देश के कई शहरों में गरबा और डांडिया उत्सव आयोजित किए जाते हैं, जिनमें उनकी प्रस्तुतियों को लेकर दर्शकों में खास उत्साह रहता है। लाइव कॉन्सर्ट, स्टेज शो और नवरात्रि के विशेष कार्यक्रम उनकी पेशेवर गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बड़े आयोजनों में टिकटों की कीमत आयोजन की जगह, सुविधाओं और टिकट की श्रेणी के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। वर्ष 2026 में मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में 11 से 19 अक्टूबर तक प्रस्तावित ‘वेस्ट एवेन्यू रियल्टी नवरात्रि उत्सव 2026’ भी चर्चा में है। इस आयोजन में फाल्गुनी पाठक की प्रस्तुति को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी है। कार्यक्रम की तारीखों, कलाकारों की प्रस्तुति और टिकट की कीमतों से जुड़ी जानकारी के लिए आयोजकों की आधिकारिक घोषणा देखना उचित होगा। नवरात्रि के दौरान उनकी लोकप्रियता यह दिखाती है कि उनके गाने सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव का हिस्सा बन चुके हैं।

निजी जिंदगी को लाइमलाइट से दूर रखती हैं फाल्गुनी

फाल्गुनी पाठक की सार्वजनिक पहचान जितनी बड़ी है, उनकी निजी जिंदगी उतनी ही निजी रही है। उन्होंने अपने करियर में संगीत और मंचीय प्रस्तुतियों को प्राथमिकता दी है और घरेलू जीवन को मीडिया की सुर्खियों से दूर रखा है। एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि नवरात्रि के समय वह अधिक चर्चा में रहती हैं, जबकि साल के बाकी महीनों में भी उनके कार्यक्रम होते हैं। उन्हें अपने काम और प्रस्तुतियों के दौरान मिलने वाला प्रचार पसंद है। उनकी शादी और निजी रिश्तों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। वर्ष 2012 में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने खुद को सिंगल बताया था और कहा था कि वह अपनी जिंदगी से खुश हैं। फाल्गुनी की यही निजी स्वभाव वाली छवि उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग बनाती है। वह अपनी पहचान को मुख्य रूप से अपने संगीत और लाइव शो के जरिए बनाए रखती हैं।

बॉलीवुड में क्यों नहीं बनाया प्लेबैक सिंगिंग को करियर?

फाल्गुनी पाठक ने निजी म्यूजिक एल्बम और लाइव शो के जरिए बड़ी सफलता हासिल की, लेकिन उन्होंने हिंदी फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग को अपने करियर का मुख्य हिस्सा नहीं बनाया। वर्ष 2013 में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया था कि उन्होंने बॉलीवुड में करियर बनाने के लिए कभी गंभीरता से प्रयास नहीं किया। उनके मुताबिक, फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के लिए काफी भागदौड़ करनी पड़ती है और प्रतिस्पर्धा भी अधिक है। उन्हें अपने संगीत की दुनिया में काम करना ज्यादा पसंद था। वर्ष 2024 में पीटीआई से बातचीत के दौरान भी उन्होंने लाइव प्रस्तुतियों के प्रति अपने लगाव का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि वह फिल्मों में काम करने से इनकार नहीं करतीं, लेकिन मंच पर दर्शकों के सामने गाना उन्हें ज्यादा खुशी और संतुष्टि देता है। फाल्गुनी के लिए लाइव परफॉर्मेंस केवल गाने का माध्यम नहीं, बल्कि दर्शकों के साथ सीधे जुड़ने का अनुभव है। यही वजह है कि उन्होंने अपनी पहचान बनाने के लिए एक अलग रास्ता चुना। उनका लोकप्रिय गीत ‘याद पिया की आने लगी’ वर्ष 1999 की फिल्म ‘प्यार कोई खेल नहीं’ में भी शामिल किया गया था। इस फिल्म में सनी देओल और महिमा चौधरी मुख्य भूमिकाओं में थे।

आज भी क्यों लोकप्रिय हैं फाल्गुनी पाठक के गाने?

समय के साथ संगीत सुनने का तरीका काफी बदल गया है। एक दौर में लोग कैसेट और म्यूजिक चैनलों पर अपने पसंदीदा गाने सुनते थे, जबकि आज डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल फोन के जरिए संगीत तक पहुंच आसान हो गई है। इसके बावजूद फाल्गुनी पाठक के गानों की लोकप्रियता बरकरार है। नवरात्रि आते ही ‘मैंने पायल है छनकाई’, ‘याद पिया की आने लगी’ और ‘चूड़ी जो खनके’ जैसे गाने फिर से सुनाई देने लगते हैं। इन गानों की लोकप्रियता का कारण सिर्फ पुरानी यादें नहीं हैं। कई लोगों के लिए ये गीत बचपन, दोस्तों, परिवार और गरबा के साथ बिताए गए खास पलों से जुड़े हैं। नई पीढ़ी भी इन गानों पर उसी उत्साह के साथ गरबा करती है, जिस तरह पहले की पीढ़ियां किया करती थीं। यही वजह है कि फाल्गुनी पाठक का संगीत समय के साथ पुराना पड़ने के बजाय हर नवरात्रि में फिर से लोकप्रिय हो जाता है।

25 रुपये से शुरू हुआ सफर बना प्रेरणा

फाल्गुनी पाठक की कहानी बताती है कि सफलता के लिए जरूरी नहीं कि किसी कलाकार की शुरुआत बड़े मंच या संगीत की औपचारिक शिक्षा से ही हो। संगीत के प्रति लगाव, लगातार अभ्यास, अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश और दर्शकों से जुड़ाव भी किसी कलाकार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं। बचपन में छत पर गाने वाली फाल्गुनी ने छोटे कार्यक्रमों से शुरुआत की। फिर डांडिया ग्रुप, अपना म्यूजिक ग्रुप और सुपरहिट निजी एल्बम के जरिए उन्होंने ऐसा मुकाम हासिल किया कि नवरात्रि और गरबा का जिक्र उनके बिना अधूरा लगता है। आज फाल्गुनी पाठक सिर्फ एक लोकप्रिय गायिका नहीं हैं, बल्कि उन कलाकारों में शामिल हैं जिनका संगीत एक त्योहार की पहचान बन चुका है। यही उनके लंबे करियर और लोकप्रियता की सबसे बड़ी खासियत है।

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