यहां कदम रखने वाले मुख्यमंत्रियों की चली गई कुर्सी!
अशोकनगर। मध्यप्रदेश की राजनीति में सत्ता, चुनाव और समीकरणों की चर्चाएं तो आम हैं, लेकिन प्रदेश के अशोकनगर जिला मुख्यालय से जुड़ी एक ऐसी मान्यता, धारणा और मिथक भी है, जो दशकों से राजनीतिक गलियारों में कौतूहल पैदा करती रही है। कहा जाता है कि जो भी मुख्यमंत्री अशोकनगर शहर आता है, उसे कुछ समय बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ती है। किसी की सरकार चली गई, किसी को पद छोड़ना पड़ा तो कोई चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो गया। इन घटनाओं को जोड़कर स्थानीय स्तर पर एक मिथक बन गया।
अब सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अशोकनगर के इस चर्चित मिथक को तोड़ पाएंगे? क्या उनकी राजनीतिक पारी इस मान्यता को गलत साबित करेगी, या फिर अशोकनगर का यह किस्सा आगे भी चर्चाओं में बना रहेगा?
दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव उज्जैन में रात नहीं रुकने से जुड़ी पुरानी मान्यता को पीछे छोड़ चुके हैं। इसी वजह से अशोकनगर को लेकर भी उनसे उम्मीदें जोड़ी गई थीं। हालांकि, अशोकनगर जिले के किसी गांव में मुख्यमंत्री का पहुंचना और जिला मुख्यालय में जाकर इस मिथक को चुनौती देना दो अलग-अलग बातें हैं। जनवरी 2026 में भी मोहन यादव जिले के मढ़ी महिदपुर गांव में जनसुनवाई के लिए पहुंचे थे।
आखिर क्या है अशोकनगर का मिथक?
अशोकनगर जिला मुख्यालय को लेकर प्रचलित मान्यता के अनुसार, यहां मुख्यमंत्री के दौरे के बाद उनकी राजनीतिक पारी में कोई न कोई बड़ा बदलाव हुआ। किसी की कुर्सी चली गई, किसी की सरकार का कार्यकाल समाप्त हुआ तो किसी को दोबारा सत्ता में लौटने का अवसर नहीं मिला।
इस चर्चा में शहर के प्राचीन राजराजेश्वर महादेव मंदिर का नाम भी लिया जाता है। कुछ स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, मंदिर में भगवान शिव-पार्वती राजा-रानी के स्वरूप में विराजमान हैं। इस कारण शहर में मुख्यमंत्री के आगमन और उनकी कुर्सी जाने के किस्से को धार्मिक आस्था से भी जोड़कर देखा जाता है।
हालांकि, यह लोकमान्यता है, कोई प्रमाणित ऐतिहासिक या राजनीतिक नियम नहीं। मुख्यमंत्रियों का पद जाना, सरकारों का गिरना और चुनाव हारना अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में हुआ। इन घटनाओं को अशोकनगर के दौरे का परिणाम मानने का कोई प्रमाण नहीं है।
किन मुख्यमंत्रियों के नाम इस मिथक से जोड़े जाते हैं?
अशोकनगर में मुख्यमंत्री के दौरे और उसके बाद सत्ता परिवर्तन की चर्चा में कई पूर्व मुख्यमंत्रियों के नाम लिए जाते हैं। अलग-अलग समाचार रिपोर्टों में नामों और संख्या को लेकर अंतर मिलता है। प्रमुख रूप से जिन नेताओं का उल्लेख किया जाता है, उनमें ये नाम शामिल हैं।
1. प्रकाशचंद्र सेठी
वर्ष 1975 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी अशोकनगर में कांग्रेस के एक अधिवेशन में शामिल होने आए थे। बाद में वह मुख्यमंत्री पद पर नहीं रहे। उनके दौरे और पद से हटने के घटनाक्रम को इस मिथक से जोड़कर देखा जाने लगा।
2. श्यामाचरण शुक्ल
श्यामाचरण शुक्ल का नाम भी इस चर्चा में प्रमुखता से आता है। समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, वह 1977 में अशोकनगर में तुलसी सरोवर के लोकार्पण कार्यक्रम में पहुंचे थे। बाद में मध्यप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ और उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल समाप्त हो गया।
3. कैलाश जोशी
कैलाश जोशी का नाम भी अशोकनगर के मिथक से जुड़ी कुछ पुरानी रिपोर्टों में मिलता है। वर्ष 1977 में मुख्यमंत्री बने जोशी का कार्यकाल राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच समाप्त हुआ। उनके मामले में दौरे की सटीक तारीख और घटनाक्रम की पुष्टि के लिए अतिरिक्त ऐतिहासिक दस्तावेजों की जरूरत है।
4. वीरेंद्र कुमार सखलेचा
वीरेंद्र कुमार सखलेचा भी उन मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं, जिनका नाम कुछ समाचार रिपोर्टों में अशोकनगर से जुड़ी इस मान्यता के संदर्भ में सामने आता है। उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल 1980 में समाप्त हुआ।
5. अर्जुन सिंह
अर्जुन सिंह का नाम भी इस मिथक से जुड़ा है। वह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए अशोकनगर आए थे। बाद में उन्हें पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया और मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। इस राजनीतिक घटनाक्रम को भी शहर से जुड़ी मान्यता का हिस्सा बनाया गया।
6. मोतीलाल वोरा
मोतीलाल वोरा का नाम भी इस सूची में शामिल है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, वह अशोकनगर में रेलवे फुटओवर ब्रिज के उद्घाटन कार्यक्रम में पहुंचे थे। बाद में मुख्यमंत्री पद पर उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।
7. सुंदरलाल पटवा
1992 में सुंदरलाल पटवा के मुख्यमंत्री रहते हुए अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ। इसके बाद मध्यप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया और उनकी सरकार चली गई। अशोकनगर के दौरे को इस राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़कर मिथक का हिस्सा बनाया गया।
8. दिग्विजय सिंह

दिग्विजय सिंह का नाम भी इस चर्चा में आता है। वह 2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद मुख्यमंत्री पद से हटे। इसके बाद वह दोबारा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बने। उनके राजनीतिक सफर और अशोकनगर से जुड़े घटनाक्रम को भी इस मिथक में शामिल किया जाता है।
इन नामों को लेकर अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में अंतर है। कुछ रिपोर्टें छह मुख्यमंत्रियों का उल्लेख करती हैं, जबकि अन्य में आठ या उससे भी अधिक नाम दिए गए हैं। इसलिए इन सभी को एक समान, निर्विवाद ऐतिहासिक सूची के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री रहते क्यों नहीं किया अशोकनगर शहर का दौरा?
अशोकनगर के मिथक की चर्चा में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम भी खास तौर पर लिया जाता है। वह लंबे समय तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उनके कार्यकाल में अशोकनगर शहर के दौरे को लेकर कई बार चर्चाएं हुईं।
समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराज सिंह चौहान ने अशोकनगर जिला मुख्यालय का दौरा नहीं किया। हालांकि, वह जिले के आसपास के क्षेत्रों में कार्यक्रमों में शामिल होते रहे। वर्ष 2018 में विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार और कांग्रेस की सरकार बनने के बाद वह अशोकनगर शहर पहुंचे थे। उस समय वह मुख्यमंत्री नहीं थे।
क्या मोहन यादव तोड़ पाएंगे अशोकनगर का सियासी तिलिस्म?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने इस मिथक को लेकर दिलचस्प सवाल जरूर है, लेकिन इसका जवाब किसी अंधविश्वास से नहीं, बल्कि राजनीतिक तथ्यों से मिलेगा।
मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद अशोकनगर आने की उम्मीद जताई गई थी। दिसंबर 2023 की रिपोर्टों में स्थानीय भाजपा नेताओं की ओर से उन्हें अशोकनगर आने का निमंत्रण दिए जाने की बात सामने आई थी। इसके बाद उन्होंने जिले के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा भी किया। जनवरी 2026 में मढ़ी महिदपुर गांव में उनकी जनसुनवाई की खबर सामने आई।
लेकिन इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। अशोकनगर जिले में किसी गांव का दौरा करना और अशोकनगर शहर के जिला मुख्यालय में जाकर राजराजेश्वर महादेव मंदिर सहित शहर के कार्यक्रमों में भाग लेना अलग-अलग बातें हैं।
इसलिए केवल जिले में पहुंचने के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि शहर से जुड़ा मिथक पूरी तरह टूट गया है। इसके लिए मुख्यमंत्री के जिला मुख्यालय के दौरे और उससे जुड़े घटनाक्रम को स्पष्ट रूप से देखना होगा।
कुर्सी जाने का कारण शहर या बदलते राजनीतिक समीकरण?
अशोकनगर की कहानी रोचक जरूर है, लेकिन मध्यप्रदेश की राजनीति का इतिहास बताता है कि मुख्यमंत्रियों की कुर्सी जाने के पीछे अलग-अलग कारण रहे हैं। कहीं सरकार का कार्यकाल समाप्त हुआ, कहीं राष्ट्रपति शासन लागू हुआ, कहीं पार्टी के भीतर नेतृत्व बदला और कहीं विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
इन सभी घटनाओं को एक शहर के दौरे से जोड़ देना दिलचस्प किस्सा तो बना सकता है, लेकिन इसे राजनीतिक कारण-परिणाम का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
यही वजह है कि अशोकनगर का मिथक राजनीति, लोकविश्वास और संयोगों का मिश्रण बनकर आज भी चर्चा में है।
मिथक से बड़ा है विकास का सवाल
अशोकनगर के लोगों के लिए सबसे अहम बात यह है कि मुख्यमंत्री यहां आएं या नहीं, शहर और जिले के विकास कार्यों को गति मिले। सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दे किसी भी राजनीतिक मिथक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इस मान्यता को तोड़ते हैं या नहीं, यह सवाल अपनी जगह है। लेकिन लोकतंत्र में किसी मुख्यमंत्री की कुर्सी का फैसला किसी शहर की लोककथा नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया, राजनीतिक परिस्थितियों और जनता के जनादेश से होता है।
