एंग्री यंग मैन के विजय बनने की अनकही दास्तान
60 और 70 के दशक में जब भारतीय सिनेमा एक ही ढर्रे पर चल रहा था, तब लंबे कद, गहरी और बुलंद आवाज़ और आँखों में एक अजीब से आक्रोश के साथ पर्दे पर एक ऐसे कलाकार ने कदम रखा, जिसने हिंदी सिनेमा का इतिहास ही बदलकर रख दिया। वो नाम है अमिताभ बच्चन। आज वे सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की पहचान और करोड़ों दिलों में बसने वाला एक अटूट अहसास बन चुके हैं।
एक कवि ने बदलवाया नाम
11 अक्टूबर 1942 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में जन्मे अमिताभ जी का नाम उनके पिता और हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने पहले ‘इंकलाब’ रखा था। बाद में उनके साथी कवि सुमित्रानंदन पंत के सुझाव पर उनका नाम बदलकर ‘अमिताभ’ किया गया, जिसका अर्थ होता है — “वह प्रकाश जो कभी बुझे नहीं” ‘। माँ तेजी बच्चन ने उनमें रंगमंच और कला के प्रति प्रेम का बीजारोपण किया। इलाहाबाद और नैनीताल के प्रसिद्ध शेरवुड कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कोलकाता की एक शिपिंग कंपनी में नौकरी भी की, लेकिन किस्मत को तो उन्हें सिनेमा की दुनिया का बादशाह बनाना था।
संघर्ष के वो दिन: अस्वीकृति से सफलता तक
जब अमिताभ मुंबई (तब बॉम्बे) आए, तो उनका रास्ता आसान नहीं था।
ऑल इंडिया रेडियो (AIR) में उनकी भारी आवाज़ के कारण उन्हें ऑडिशन में रिजेक्ट कर दिया गया था।
1969 में फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से उन्होंने अपनी शुरुआत की, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, लेकिन इसके बाद लगातार 12 फिल्में फ्लॉप साबित हुईं।
इतने असफल दौर के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। फिर आया साल 1973, और फिल्म थी प्रकाश मेहरा की ‘जंजीर’। इंस्पेक्टर विजय के रूप में अमिताभ ने पर्दे पर कदम रखा और देखते ही देखते ‘एंग्री यंग मैन’ का एक नया युग शुरू हो गया।
सिनेमा का स्वर्णिम सफर: यादगार फिल्में
अमिताभ बच्चन के 5 से अधिक दशकों के लंबे करियर में कई ऐसी फिल्में आईं, जिन्होंने मील का पत्थर स्थापित किया:
‘जंजीर’ और ‘दीवार’ (1973-1975): सामाजिक व्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश जताने वाले ‘विजय’ का किरदार, जिसने युवाओं को उनका नया नायक दिया।
‘शोले’ (1975): ‘जय’ के किरदार में उनकी सादगी, दोस्ती के प्रति वफादारी और माउथ ऑर्गन बजाने वाला अंदाज़ आज भी भारतीय सिनेमा का सबसे यादगार हिस्सा है।
‘अमर अकबर एंथनी’ और ‘डॉन’ (1977-1978): जहाँ एक तरफ ‘एंथनी गोंसाल्विस’ के रूप में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने सबको हँसाया, वहीं ‘डॉन’ के दोहरे किरदार में उनके अभिनय ने सिनेमाघरों में तहलका मचा दिया।
‘सिलसिला’ और ‘कभी कभी’: सिर्फ एक्शन ही नहीं, एंग्री यंग मैन ने पर्दे पर गंभीर और रूमानियत भरे प्रेम की परिभाषा भी गढ़ी।
सदाबहार वापसी (‘शंहशाह’, ‘अग्निपथ’): ‘अग्निपथ’ (1990) में ‘विजय दीनानाथ चौहान’ के किरदार और आवाज़ के कड़क प्रयोग ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया।
ढलती उम्र में भी चमकता अभिनय: नया अवतार
जब दौर बदला और मुख्य अभिनेता की भूमिकाएं सीमित होने लगीं, तब अमिताभ बच्चन ने खुद को नए सांचे में ढाला:
सहानुभूति और परिपक्वता वाली भूमिकाएं: ‘मोहब्बतें’, ‘बागबान’ और ‘ब्लैक’ जैसी फिल्मों से उन्होंने साबित कर दिया कि एक सच्चा कलाकार कभी पुराना नहीं होता। ‘ब्लैक’ में एक अंधे-बहरे बच्चे के शिक्षक की भूमिका उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियों में से एक मानी जाती है।
प्रयोगधर्मिता: ‘पा’ (Paa) में प्रोजेरिया बीमारी से पीड़ित बच्चे का किरदार हो, ‘पीकू’ में अपनी सनक से हँसाने वाले पिता का रूप हो, या फिर ‘पिंक’ में एक दृढ़ वकील के ज़रिए “नो मीन्स नो” का मजबूत संदेश देना हो—उन्होंने हर किरदार में अपनी छाप छोड़ी।
छोटे पर्दे का ‘कौन बनेगा करोड़पति’
सन 2000 में जब उनका प्रोडक्शन हाउस एबीसीएल (ABCL) वित्तीय संकट से गुजर रहा था, तब उन्होंने छोटे पर्दे (TV) का रुख किया और ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) की शुरुआत की। उनकी शालीनता, गंभीर आवाज़ और “देवियों और सज्जनों…” कहने के अनोखे अंदाज़ ने भारत के घर-घर में उन्हें हर परिवार का सबसे चहेता सदस्य बना दिया।
सिर्फ एक कलाकार नहीं, एक मिसाल
अमिताभ बच्चन सिर्फ एक महान अभिनेता भर नहीं हैं, वे लगन, अनुशासन, आत्म-विश्वास और कभी हार न मानने के जज्बे का प्रतीक हैं। गंभीर दुर्घटनाओं, जानलेवा बीमारियों और करियर के उतार-चढ़ाव को पार करते हुए उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है, वह हर पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। आज भी जब वे हर इतवार अपने घर ‘जलसा’ के बाहर प्रशंसकों का हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं, तो यह अहसास होता है कि सदियाँ बीत जाएँगी, लेकिन अमिताभ बच्चन जैसा सितारा सिनेमा के क्षितिज पर हमेशा अमर रहेगा।