
मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
अदालत के सामने सवाल है कि Prevention of Money Laundering Act यानी PMLA के तहत ED की ओर से किए गए provisional attachment की समीक्षा करने वाली Adjudicating Authority में न्यायिक सदस्य का होना कितना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या एक सदस्य वाली अथॉरिटी, विशेष रूप से तब जब उसमें न्यायिक सदस्य शामिल न हो, संपत्ति अटैच करने जैसे गंभीर फैसले की पर्याप्त समीक्षा कर सकती है।
मामले में याचिकाकर्ताओं की दलील है कि Adjudicating Authority अर्ध-न्यायिक यानी quasi-judicial भूमिका निभाती है। ऐसे में उसके ढांचे में न्यायिक विशेषज्ञता का होना जरूरी है।
हजारों मामलों का भी उठा सवाल
सुनवाई के दौरान ED के मामलों की संख्या और उनके ट्रायल तक पहुंचने से संबंधित आंकड़ों का मुद्दा भी सामने आया।
अदालत ने अथॉरिटी पर मामलों के भारी बोझ और निर्धारित समय के भीतर बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा करने की व्यावहारिकता को लेकर सवाल किए।
इस मामले का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि संपत्ति अटैच होने से संबंधित व्यक्ति या संस्था को लंबे समय तक गंभीर आर्थिक परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में फैसला सुरक्षित रखा है और ED से संबंधित आंकड़े भी मांगे हैं।
अदालत का अंतिम फैसला भविष्य में PMLA के तहत संपत्ति अटैचमेंट की समीक्षा प्रक्रिया और Adjudicating Authority की संरचना पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।








