मृदुभाषी डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली का रामलीला मैदान सिर्फ रामलीला के मंचन या राजनीतिक रैलियों का स्थल नहीं है। यह मैदान भारतीय इतिहास के उन पन्नों का गवाह रहा है, जहां कभी आजादी की आवाज बुलंद हुई, कभी सत्ता के खिलाफ आंदोलन ने जोर पकड़ा तो कभी देश की राजनीति ने नई करवट ली। यहां मोहम्मद अली जिन्ना की सभा से लेकर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन, बाबा रामदेव के अनशन और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तक ने देश का ध्यान खींचा है। इसी ऐतिहासिक मैदान में आज एक बार फिर विपक्षी दलों का जमावड़ा लगा है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के खिलाफ विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर इंडिया गठबंधन के नेता यहां एकजुट हुए हैं। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी समेत विपक्ष के कई बड़े चेहरे इस जुटान का हिस्सा हैं। विपक्ष ने बड़ी संख्या में लोगों को जुटाने का लक्ष्य रखा है।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर दिल्ली के बीचोंबीच स्थित इस मैदान में ऐसा क्या खास है कि जब भी देश की राजनीति में बड़ा आंदोलन खड़ा होता है, तो रामलीला मैदान चर्चा के केंद्र में आ जाता है? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक मैदान की कहानी, जिसने मुगल बादशाह से लेकर आधुनिक भारतीय राजनीति तक का दौर देखा है।
बहादुर शाह जफर से शुरू हुई रामलीला की परंपरा
आज जिस जगह पर रामलीला मैदान है, उसके बारे में प्रचलित इतिहास बताता है कि कभी यहां तालाब हुआ करता था। बाद में यह क्षेत्र खेती और आबादी का हिस्सा बन गया। यह इलाका पुराने इंद्रपत गांव से भी जुड़ा बताया जाता है।
1850 के दशक में अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के समय यहां रामलीला के आयोजन की परंपरा शुरू होने की मान्यता है। धीरे-धीरे पुरानी दिल्ली के विभिन्न संगठनों ने यहां रामलीला का मंचन करना शुरू कर दिया। इसी वजह से इस जगह की पहचान रामलीला मैदान के रूप में स्थापित हो गई।
हालांकि, अंग्रेजी शासन के दौरान इस धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन पर रोक लगा दी गई। वर्ष 1883 में ब्रिटिश प्रशासन ने इस स्थान का इस्तेमाल सैनिकों के शिविर के लिए करना शुरू कर दिया। लंबे समय तक यहां रामलीला का आयोजन नहीं हो सका।
इसके बाद पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से 1911 में एक बार फिर रामलीला के आयोजन की अनुमति मिली। इसके बाद यह परंपरा दोबारा शुरू हुई और आज तक जारी है।
जिन्ना को मौलाना कहने पर जताई थी नाराजगी

रामलीला मैदान का इतिहास केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहा। आजादी से पहले यह राजनीतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था।
बताया जाता है कि वर्ष 1945 में यहां आयोजित एक सभा में मोहम्मद अली जिन्ना को भीड़ ने मौलाना कहकर संबोधित किया था। हालांकि, जिन्ना को यह संबोधन पसंद नहीं आया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह धार्मिक मौलाना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक नेता हैं।
इस मैदान पर जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं ने भी जनसभाओं के माध्यम से लोगों को संबोधित किया। आजादी की लड़ाई के दौरान यह स्थान राजनीतिक जागरूकता और जनसमर्थन जुटाने का अहम केंद्र बना रहा।
वर्ष 1952 में भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर यहां सत्याग्रह किया। इस आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति में इस मैदान की पहचान को और मजबूत किया।
नेहरू से लेकर शास्त्री तक, बड़े नेताओं की आवाज से गूंजा मैदान

आजादी के बाद रामलीला मैदान का महत्व और बढ़ गया। वर्ष 1955 में इसकी चारदीवारी बनाई गई और स्थायी मंच का निर्माण हुआ।
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1956 और 1957 में यहां बड़ी जनसभाएं कीं। जनवरी 1961 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय भी यहां एक विशाल सभा में शामिल हुईं।
भारत-चीन युद्ध के बाद 1963 में इसी मैदान पर एक ऐसा ऐतिहासिक सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ, जिसे देश आज भी याद करता है। मशहूर गायिका लता मंगेशकर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में देशभक्ति गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ प्रस्तुत किया था। इस गीत ने युद्ध के बाद देशवासियों के भीतर देशभक्ति और राष्ट्रीय एकजुटता की भावना को नई ऊर्जा दी।
वर्ष 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सभा के दौरान यहां ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा भी गूंजा। पाकिस्तान के साथ युद्ध के उस दौर में इस नारे ने सैनिकों और किसानों के महत्व को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया।
1975: जब इसी मैदान से उठी थी इंदिरा सरकार के खिलाफ सबसे बड़ी चुनौती

रामलीला मैदान के इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख बेहद महत्वपूर्ण है। इसी दिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ विशाल जनसभा को संबोधित किया था।
इस सभा में जयप्रकाश नारायण ने सत्ता के खिलाफ जनता को एकजुट होने का आह्वान किया। इसी दौरान कवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पंक्ति ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ ने आंदोलन को नई पहचान दी।
इस सभा के कुछ ही समय बाद देश में आपातकाल लागू हो गया। लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर देशभर में बहस और विरोध का दौर शुरू हुआ।
आपातकाल समाप्त होने के बाद वर्ष 1977 में विपक्षी दलों ने इसी मैदान में एकजुट होकर नई राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर समेत कई नेताओं की मौजूदगी में जनता पार्टी की राजनीतिक एकजुटता सामने आई। इसी राजनीतिक धारा ने आगे चलकर केंद्र में सरकार बनाई और कांग्रेस के लंबे राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती दी।
2011: बाबा रामदेव के आंदोलन से आधी रात की पुलिस कार्रवाई तक

नई सदी में भी रामलीला मैदान बड़े आंदोलनों का केंद्र बना रहा। वर्ष 2011 में योगगुरु बाबा रामदेव ने विदेशों में जमा कथित काले धन को भारत वापस लाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ यहां आंदोलन शुरू किया।
इस आंदोलन में बड़ी संख्या में समर्थक जुटे। अनशन और विरोध प्रदर्शन के बीच दिल्ली पुलिस की आधी रात को की गई कार्रवाई ने पूरे देश में विवाद खड़ा कर दिया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए बल प्रयोग किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। इस घटना ने सरकार की कार्यशैली और विरोध प्रदर्शनों से निपटने के तरीके पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी।
अन्ना हजारे के आंदोलन ने बदल दिया देश का राजनीतिक माहौल

वर्ष 2011 में ही रामलीला मैदान ने एक और बड़े आंदोलन को देखा। इस बार आंदोलन का चेहरा थे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे।
मुद्दा था भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए मजबूत जनलोकपाल कानून की मांग। अन्ना हजारे के अनशन को देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिला। दिल्ली से लेकर छोटे शहरों तक लोग इस आंदोलन से जुड़ते चले गए।
रामलीला मैदान में कई दिनों तक चले इस आंदोलन ने तत्कालीन केंद्र सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बनाया। भ्रष्टाचार के खिलाफ उठी इस आवाज ने देश की राजनीति में नए समीकरण पैदा किए। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस आंदोलन ने आगे चलकर भारतीय राजनीति में कई नए चेहरों और नई राजनीतिक ताकतों के उभरने की जमीन तैयार की।
इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि से आम आदमी पार्टी के गठन का रास्ता भी निकला। अरविंद केजरीवाल सहित आंदोलन से जुड़े कई लोग बाद में सक्रिय राजनीति में आए।
केजरीवाल और रेखा गुप्ता का शपथग्रहण भी इसी मैदान में

रामलीला मैदान ने केवल आंदोलन ही नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन और नई सरकारों के गठन के ऐतिहासिक क्षण भी देखे हैं।
28 दिसंबर 2013 को अरविंद केजरीवाल ने पहली बार दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ इसी मैदान में ली थी। यह आयोजन इसलिए भी खास था क्योंकि आम आदमी पार्टी ने अपने गठन के कुछ ही समय बाद दिल्ली की सत्ता तक पहुंचकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बना ली थी।
इसके बाद 20 फरवरी 2025 को भाजपा की दिल्ली में सत्ता में वापसी के बाद रेखा गुप्ता ने भी इसी मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस तरह रामलीला मैदान ने अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और दलों की सरकारों के गठन का गवाह बनने का अनूठा रिकॉर्ड बनाया।
आखिर क्यों खास है रामलीला मैदान?
रामलीला मैदान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसने भारतीय राजनीति के लगभग हर बड़े दौर को करीब से देखा है। यहां धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक आयोजन हुए तो आजादी की लड़ाई की आवाज भी बुलंद हुई। लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंदोलन हुए तो भ्रष्टाचार के खिलाफ जनसैलाब भी उमड़ा।
इस मैदान पर सत्ता पक्ष ने अपनी ताकत दिखाई है और विपक्ष ने सरकारों को चुनौती भी दी है। यहां उठे नारों ने कई बार देश की राजनीतिक दिशा और जनमत को प्रभावित किया है।
अब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर विपक्षी दलों की मौजूदा रैली ने एक बार फिर इस ऐतिहासिक स्थल को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।
बहादुर शाह जफर के दौर की रामलीला से शुरू हुई इस मैदान की पहचान आजादी की लड़ाई, आपातकाल के विरोध, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों और सत्ता परिवर्तन तक पहुंच चुकी है। यही वजह है कि दिल्ली का रामलीला मैदान महज एक आयोजन स्थल नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के संघर्षों, आंदोलनों और राजनीतिक बदलावों का जीवंत गवाह माना जाता है।