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Smita Patil Birth Anniversary: ‘आज रपट जाएं’ गाने के बाद रातभर रोई थीं स्मिता पाटिल, जानिए गंभीर दिखने वाली इस अदाकारा के दिलचस्प किस्से

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सड़क पर गिरी एक तस्वीर ने बदल दी किस्मत, दूरदर्शन की न्यूज एंकर से बनीं हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री; 31 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा, मगर अभिनय की विरासत आज भी कायम

नई दिल्ली। कुछ कलाकार अपनी लंबी फिल्मी पारी के लिए याद किए जाते हैं, तो कुछ ऐसे होते हैं जो कम समय में ही अभिनय की दुनिया पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। अभिनेत्री स्मिता पाटिल ऐसी ही अदाकारा थीं। पर्दे पर उनकी आंखों की गंभीरता, चेहरे के भाव और संवाद बोलने का अंदाज दर्शकों को किरदार की दुनिया में ले जाता था। उन्होंने अपने छोटे से फिल्मी सफर में ऐसी भूमिकाएं निभाईं, जिन्हें आज भी भारतीय सिनेमा की अनमोल धरोहर माना जाता है। 17 अक्टूबर 1956 को जन्मीं स्मिता पाटिल अगर आज हमारे बीच होतीं, तो अपना 71वां जन्मदिन मना रही होतीं। लेकिन महज 31 साल की उम्र में उनका जीवन समाप्त हो गया। उनके जाने के दशकों बाद भी उनकी फिल्में, अभिनय और जिंदगी से जुड़े किस्से लोगों की दिलचस्पी का हिस्सा बने हुए हैं।

स्मिता पाटिल की कहानी सिर्फ एक सफल अभिनेत्री की कहानी नहीं है। यह उस कलाकार की दास्तान भी है, जिसने गंभीर और चुनौतीपूर्ण किरदारों के साथ व्यावसायिक फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई। दिलचस्प बात यह है कि पर्दे पर अक्सर बेहद संजीदा नजर आने वाली स्मिता असल जिंदगी में शरारती थीं। उन्हें गाड़ी चलाने का शौक था, वह दोस्तों के साथ खूब मस्ती करती थीं और कभी-कभी ऐसी जिद भी पकड़ लेती थीं कि आसपास के लोग हैरान रह जाते थे। उनकी जिंदगी के कुछ किस्से उनके व्यक्तित्व के इसी अनदेखे पहलू को सामने लाते हैं।

जन्म के समय चेहरे पर थी मुस्कान, इसलिए नाम पड़ा स्मिता

स्मिता पाटिल का जन्म पुणे में एक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार में हुआ था। उनके पिता शिवाजीराव गिरधर पाटिल महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़े थे और मां विद्या ताई पाटिल सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय थीं। बताया जाता है कि जन्म के समय स्मिता के चेहरे पर मुस्कान देखकर उनकी मां ने उनका नाम स्मिता रखा। उनके नाम का अर्थ भी मुस्कान से जुड़ा है।

बाद में यही मुस्कान और उनके चेहरे के सहज भाव उनकी पहचान का हिस्सा बन गए। हालांकि, फिल्मों में उन्हें अक्सर गंभीर, संघर्षशील और भीतर से मजबूत महिलाओं के किरदारों में देखा गया। उनके अभिनय की खासियत यह थी कि वह बहुत कम शब्दों और चेहरे के छोटे-छोटे बदलावों से भी भावनाओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त कर देती थीं।

स्मिता का व्यक्तित्व केवल गंभीरता तक सीमित नहीं था। उनकी जीवनी से जुड़ी जानकारियों के मुताबिक, निजी जीवन में वह बेहद साधारण और मस्ती पसंद थीं। उन्हें किसी बड़ी फिल्मी स्टार जैसी जिंदगी जीने की विशेष चाह नहीं थी। अभिनय उनके लिए सिर्फ प्रसिद्धि हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने किरदार को समझने और उसे सच्चाई के साथ निभाने का जरिया था।

सड़क पर गिरी तस्वीर ने बदल दी किस्मत

स्मिता पाटिल की जिंदगी का एक दिलचस्प मोड़ उस समय आया, जब उनकी एक तस्वीर ने उन्हें दूरदर्शन तक पहुंचा दिया। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने बॉम्बे दूरदर्शन में मराठी समाचार वाचिका के रूप में काम किया था। उनकी टीवी तक पहुंचने की कहानी भी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती।

बताया जाता है कि स्मिता की एक तस्वीर सड़क पर गिर गई थी। यह तस्वीर दूरदर्शन के एक अधिकारी तक पहुंची और उन्हें पसंद आई। इसके बाद स्मिता को टेलीविजन पर काम करने का अवसर मिला। इस तरह समाचार पढ़ने से शुरू हुआ उनका सफर आगे चलकर बड़े पर्दे तक पहुंचा।

उनकी आवाज, चेहरे की अभिव्यक्ति और कैमरे के सामने सहज रहने की क्षमता ने उन्हें टेलीविजन पर पहचान दिलाई। उस दौर में दूरदर्शन पर समाचार पढ़ना केवल खबरों को शब्दों में सुनाना नहीं था, बल्कि स्पष्ट उच्चारण, संयमित प्रस्तुति और आत्मविश्वास भी जरूरी था। स्मिता ने इस अनुभव से कैमरे के सामने काम करने की समझ हासिल की, जो आगे चलकर उनके अभिनय करियर में उपयोगी साबित हुई।

उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे से अभिनय का प्रशिक्षण भी लिया। यहां से उन्हें अभिनय की बारीकियां सीखने का अवसर मिला। टेलीविजन के अनुभव और औपचारिक प्रशिक्षण ने मिलकर उनके फिल्मी सफर की जमीन तैयार की।

श्याम बेनेगल की फिल्मों से मिली पहचान

स्मिता पाटिल के फिल्मी सफर की शुरुआत शुरुआती परियोजनाओं से हुई, लेकिन श्याम बेनेगल की फिल्म ‘चरणदास चोर’ ने उन्हें मुख्यधारा के दर्शकों के सामने पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने ऐसी फिल्मों में काम किया, जिनमें अभिनय के लिए बाहरी चमक-दमक से अधिक भावनाओं की गहराई और किरदार की सच्चाई जरूरी थी।

‘भूमिका’, ‘मंथन’, ‘निशांत’, ‘आक्रोश’, ‘चक्र’, ‘मिर्च मसाला’, ‘अर्थ’ और ‘मंडी’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने अलग-अलग सामाजिक और मानवीय परिस्थितियों को पर्दे पर जीवंत किया। इन फिल्मों में उन्होंने ऐसे पात्र निभाए, जो सामाजिक दबाव, व्यक्तिगत संघर्ष, रिश्तों की उलझनों और अपने अस्तित्व की लड़ाई से गुजरते हैं।

स्मिता की खासियत थी कि वह किरदार को केवल निभाती नहीं थीं, बल्कि उसकी परिस्थितियों और भावनाओं को अपने अभिनय में उतार देती थीं। उनकी आंखों में दिखाई देने वाला दर्द, संवादों के बीच का मौन और चेहरे पर उभरते भाव कई बार बिना किसी लंबे भाषण के ही कहानी कह देते थे।

हालांकि, स्मिता ने केवल समानांतर सिनेमा तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने ‘नमक हलाल’ और ‘शक्ति’ जैसी व्यावसायिक फिल्मों में भी काम किया। इस तरह उन्होंने यह दिखाया कि गंभीर अभिनय करने वाली अभिनेत्री मनोरंजन प्रधान फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बना सकती है।

‘आज रपट जाएं’ की शूटिंग के बाद रातभर क्यों रोई थीं स्मिता?

स्मिता पाटिल के जीवन से जुड़ा एक किस्सा फिल्म ‘नमक हलाल’ के लोकप्रिय गीत ‘आज रपट जाएं’ को लेकर अक्सर चर्चा में आता है। इस गाने में उनके साथ अमिताभ बच्चन नजर आए थे। गीत में बारिश के बीच रोमांटिक दृश्य फिल्माए गए थे, लेकिन पर्दे पर दिखाई देने वाले इस दृश्य के पीछे स्मिता के लिए भावनात्मक असहजता की कहानी बताई जाती है।

मीडिया रिपोर्टों और उनसे जुड़े संस्मरणों के मुताबिक, गाने की शूटिंग के दौरान स्मिता पाटिल सहज महसूस नहीं कर रही थीं। गंभीर और कलात्मक फिल्मों में काम करने के कारण उनकी छवि एक ऐसी अभिनेत्री की बन चुकी थी, जो अपने किरदारों को लेकर काफी संवेदनशील रहती थीं। रोमांटिक और अपेक्षाकृत ग्लैमरस अंदाज में फिल्माए जा रहे इस गीत को लेकर वह असमंजस में थीं।

बताया जाता है कि शूटिंग के दौरान वह भावुक हो गईं और बाद में रातभर रोती रहीं। अमिताभ बच्चन ने उन्हें समझाया कि यह दृश्य फिल्म की कहानी और पटकथा की मांग के अनुरूप है। उनके समझाने के बाद स्मिता ने अपनी झिझक पर काबू पाया और शूटिंग पूरी की।

इस किस्से को समझने के लिए यह याद रखना जरूरी है कि किसी कलाकार के लिए पर्दे पर निभाया जाने वाला दृश्य केवल कैमरे के सामने की गतिविधि नहीं होता। उसके साथ निजी सहजता, किरदार की समझ और अभिनय की सीमाओं को लेकर भी भावनाएं जुड़ी हो सकती हैं। स्मिता के बारे में बताया जाने वाला यह प्रसंग उनके संवेदनशील स्वभाव को सामने लाता है। हालांकि, रातभर रोने की घटना के विवरण को अलग-अलग रिपोर्टों में एक जैसे ढंग से दर्ज नहीं किया गया है, इसलिए इसे उनके जीवन से जुड़ा प्रचलित किस्सा मानकर ही देखना उचित है।

दिलचस्प बात यह है कि ‘आज रपट जाएं’ आगे चलकर हिंदी सिनेमा के चर्चित गीतों में शामिल हुआ। आज भी इस गीत को याद करते समय स्मिता पाटिल और अमिताभ बच्चन की जोड़ी का जिक्र होता है। पर्दे पर सहज दिखने वाले इस गीत के पीछे स्मिता की भावनात्मक प्रतिक्रिया का किस्सा उनके व्यक्तित्व के एक अलग पहलू को सामने लाता है।

10 साल का फिल्मी करियर, लेकिन पुरस्कारों की लंबी विरासत

स्मिता पाटिल का फिल्मी करियर लगभग एक दशक तक चला, लेकिन इस छोटी अवधि में उन्होंने जो काम किया, उसने उन्हें भारतीय सिनेमा की प्रमुख अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया। वर्ष 1977 में आई फिल्म ‘भूमिका’ उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव बनी। इस फिल्म में उनके अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

उनके अभिनय को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने के साथ-साथ कई प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया। वर्ष 1985 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके योगदान और भारतीय सिनेमा में उनकी विशिष्ट पहचान को रेखांकित करता है।

उनकी फिल्मों की खासियत यह थी कि वे अपने समय के सामाजिक सवालों को भी उठाती थीं। ग्रामीण जीवन, महिलाओं की स्थिति, पारिवारिक संबंध, सामाजिक असमानता और व्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे विषयों पर बनी फिल्मों में स्मिता ने ऐसी भूमिकाएं निभाईं, जिनकी प्रासंगिकता समय के साथ समाप्त नहीं हुई।

आज भी अभिनय सीखने वाले कलाकारों और सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए उनकी फिल्में अध्ययन का विषय हैं। उनकी भूमिकाएं यह समझने में मदद करती हैं कि प्रभावी अभिनय के लिए केवल संवाद बोलना पर्याप्त नहीं, बल्कि पात्र की मनःस्थिति और उसकी परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है।

निजी जिंदगी में शरारती थीं स्मिता, 14-15 साल की उम्र में सीख ली थी ड्राइविंग

स्मिता पाटिल के बारे में आम धारणा यह रही कि वह गंभीर स्वभाव की थीं। लेकिन उनकी जीवनी लिखने वाली मैथिलि राव के हवाले से सामने आए विवरणों में उनके निजी व्यक्तित्व का दूसरा पहलू भी मिलता है। उनके मुताबिक, स्मिता निजी जिंदगी में बहुत साधारण थीं और स्टार बनने की महत्वाकांक्षा उनके व्यक्तित्व पर हावी नहीं थी। वह गंभीर विषयों पर सोचती थीं, लेकिन दोस्तों के साथ मस्ती करना और शरारतें करना भी उन्हें पसंद था।

उन्हें गाड़ी चलाने का बहुत शौक था। बताया जाता है कि उन्होंने 14-15 साल की उम्र में ही चुपके से ड्राइविंग सीख ली थी। यह किस्सा उनकी जिज्ञासा और स्वतंत्र स्वभाव की झलक देता है। जिस अभिनेत्री को पर्दे पर अक्सर गंभीर और विचारशील भूमिकाओं में देखा गया, वह निजी जीवन में जोखिम लेने और नई चीजें सीखने को लेकर उत्साहित रहती थीं।

ऐसे ही छोटे-छोटे प्रसंग स्मिता पाटिल को केवल एक महान अभिनेत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत और स्वाभाविक इंसान के रूप में भी सामने लाते हैं। उनकी जिंदगी की दिलचस्पी इसी विरोधाभास में है—पर्दे पर गंभीरता और निजी जीवन में शरारत, दोनों उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थे।

राज बब्बर के साथ प्रेम कहानी और पारिवारिक विरोध

स्मिता पाटिल की निजी जिंदगी भी उनके फिल्मी सफर की तरह चर्चा में रही। अभिनेता राज बब्बर के साथ उनके रिश्ते ने उस दौर में काफी सुर्खियां बटोरी थीं। दोनों की नजदीकियां फिल्म ‘भीगी पलकें’ की शूटिंग के दौरान बढ़ीं। हालांकि, इस रिश्ते के सामने पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों की जटिलताएं भी थीं।

राज बब्बर की शादी पहले ही नादिरा बब्बर से हो चुकी थी और उनके दो बच्चे थे। स्मिता के साथ विवाह के फैसले को लेकर परिवार में विरोध की खबरें सामने आईं। बताया जाता है कि राज बब्बर ने स्मिता के साथ रहने का निर्णय लेते हुए अपना घर छोड़ दिया था। वर्ष 1986 में दोनों ने विवाह किया।

स्मिता की मां भी इस रिश्ते को लेकर सहमत नहीं थीं। इसके बावजूद स्मिता ने अपने निजी जीवन से जुड़ा फैसला खुद लिया। इस रिश्ते को लेकर उस समय कई तरह की चर्चाएं हुईं, लेकिन उनकी निजी जिंदगी को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी रिश्ते की पूरी कहानी केवल सार्वजनिक खबरों से नहीं जानी जा सकती।

राज बब्बर और स्मिता पाटिल का रिश्ता उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय था। लेकिन उनके जीवन की पहचान केवल इस प्रेम कहानी तक सीमित नहीं रही। उनके अभिनय, फिल्मों और सिनेमा के प्रति संवेदनशील दृष्टि ने उन्हें एक अलग स्थान दिलाया।

राजकुमार को देखकर मेकअप के लिए पकड़ ली थी अनोखी जिद

स्मिता पाटिल से जुड़ा एक और मजेदार किस्सा फिल्म ‘गलियों का बादशाह’ की शूटिंग के दौरान का बताया जाता है। इस फिल्म के सेट पर उन्होंने अभिनेता राजकुमार को लेटकर मेकअप कराते हुए देखा। स्मिता ने इससे पहले किसी कलाकार को इस तरह मेकअप कराते नहीं देखा था।

यह दृश्य देखकर उन्होंने अपने मेकअपमैन दीपक सावंत से कहा कि वह भी लेटकर मेकअप कराना चाहती हैं। लेकिन दीपक सावंत ने उनकी मांग मानने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि लेटकर मेकअप करने से मेकअप खराब हो सकता है और काम में परेशानी आएगी।

स्मिता अपनी जिद पर अड़ी रहीं। आखिरकार, मेकअपमैन ने उन्हें काफी समझाया कि इस तरह मेकअप कराने से उनका काम बिगड़ सकता है। काफी बातचीत के बाद वह बैठकर मेकअप कराने के लिए राजी हुईं।

यह किस्सा उनके शरारती स्वभाव और नई चीजों को आजमाने की इच्छा को उजागर करता है। गंभीर किरदारों के लिए मशहूर अभिनेत्री सेट पर कभी-कभी ऐसी छोटी-छोटी जिद भी कर बैठती थीं, जो उनके साथ काम करने वालों के लिए यादगार बन जाती थी।

अंतिम विदाई में पूरी हुई आखिरी इच्छा

स्मिता पाटिल के जीवन का सबसे भावुक अध्याय उनके असमय निधन से जुड़ा है। बेटे प्रतीक बब्बर के जन्म के लगभग दो सप्ताह बाद, 13 दिसंबर 1986 को उनका निधन हो गया। रिपोर्टों में उनके निधन का कारण प्रसव के बाद हुई गंभीर चिकित्सकीय जटिलताओं को बताया गया है। वह उस समय केवल 31 वर्ष की थीं।

उनके निधन से परिवार, मित्रों और फिल्म जगत को गहरा सदमा पहुंचा। एक ऐसी अभिनेत्री, जिसका करियर तेजी से आगे बढ़ रहा था और जिसके सामने अभिनय की कई संभावनाएं थीं, अचानक दुनिया से विदा हो गई। उनके जाने से भारतीय सिनेमा ने एक ऐसी प्रतिभा खो दी, जो अलग-अलग तरह के किरदारों को अपनी संवेदनशीलता से खास बना देती थी।

उनसे जुड़ा एक मार्मिक किस्सा उनकी अंतिम विदाई को लेकर भी सुनाया जाता है। बताया जाता है कि स्मिता ने कभी इच्छा जताई थी कि निधन के बाद उन्हें सुहागन की तरह सजाया जाए। उनके निधन के बाद उनकी इस इच्छा का सम्मान किया गया और उन्हें दुल्हन की तरह तैयार किया गया।

संयोग से, उनके मेकअपमैन दीपक सावंत ही अंतिम विदाई के लिए उनका मेकअप करने पहुंचे थे। यही वह व्यक्ति थे, जिनसे स्मिता ने कभी ‘गलियों का बादशाह’ की शूटिंग के दौरान लेटकर मेकअप करने की जिद की थी। जीवन के एक साधारण और मजेदार किस्से से जुड़ा यह नाम उनकी अंतिम विदाई की भावुक स्मृति का हिस्सा बन गया।

स्मिता पाटिल आज भी क्यों याद की जाती हैं?

स्मिता पाटिल की जिंदगी छोटी थी, लेकिन उनका काम समय की सीमाओं से आगे निकल गया। उन्होंने अपने अभिनय से यह स्थापित किया कि किसी कलाकार की महानता केवल फिल्मों की संख्या या लोकप्रियता से नहीं मापी जाती। वह कितनी ईमानदारी से अपने किरदार को निभाता है और दर्शकों के मन में कैसी छाप छोड़ता है, यह अधिक महत्वपूर्ण है।

‘भूमिका’, ‘मंथन’, ‘आक्रोश’, ‘चक्र’, ‘मिर्च मसाला’, ‘अर्थ’ और ‘नमक हलाल’ जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। एक ओर वह सामाजिक यथार्थ को पर्दे पर उतारती थीं, तो दूसरी ओर व्यावसायिक सिनेमा में भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित करती थीं।

उनकी कहानी में संघर्ष है, सफलता है, निजी रिश्तों की जटिलताएं हैं, शरारती किस्से हैं और एक अधूरी रह गई जिंदगी का दर्द भी है। शायद यही वजह है कि स्मिता पाटिल केवल एक अभिनेत्री के रूप में याद नहीं की जातीं, बल्कि एक ऐसी शख्सियत के रूप में भी याद की जाती हैं, जिनकी जिंदगी और कला दोनों में गहराई थी।

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