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न्याय की अडिग प्रहरी नवी पिल्लै

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रंगभेद के खिलाफ संघर्ष से लेकर 2026 के शांति के नोबेल तक की प्रेरणादायक दास्तान

ओस्लो/स्टॉकहोम। दुनियाभर में जब युद्ध, संघर्ष और मानवीय संकटों के बादल गहरे होते जा रहे हैं, तब नॉर्वे की नोबेल समिति ने एक ऐसे शख्सियत पर भरोसा जताया है जिसने पूरी जिंदगी न्याय, मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने में झोंक दी। साल 2026 का प्रतिष्ठित शांति पुरस्कार भारतवंशी नवनीतम (नवी) पिल्लै को देने का ऐलान किया गया है। दक्षिण अफ्रीका की जमीन पर जन्मीं और संघर्षों की भट्ठी में तपकर कुंदन बनीं नवी पिल्लै का यह सफर महज एक मानवाधिकार कार्यकर्ता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उम्मीद की वह मशाल है जो अंधेरे में भी जलती रहती है।

नूर्नबर्ग की अदालत से जुड़ी गूंज और ऐतिहासिक सम्मान
नोबेल समिति ने जब इस साल के शांति पुरस्कार की घोषणा की, तो उसकी गूंज इतिहास के पन्नों तक जा पहुंची। समिति ने टिप्पणी करते हुए कहा, “हम नूर्नबर्ग की अदालत में हैं। मुझे नहीं लगता कि उनके नोबेल पुरस्कार के लिए इससे ज्यादा मजबूत प्रतीक कोई और हो सकता है।”

नूर्नबर्ग की अदालत वही ऐतिहासिक जगह है जहाँ दूसरे विश्व युद्ध के बाद नाजी जर्मनी के बड़े नेताओं पर मानवता के खिलाफ अपराधों के मुकदमे चलाए गए थे। पिल्लै को युद्ध अपराधों और नरसंहार के दोषियों को कटघरे में खड़ा करने के लिए यह सम्मान मिला है। नोबेल समिति का मानना है कि वैश्विक अशांति के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना ही शांति की एकमात्र मजबूत ढाल है।

दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में होने वाले भव्य समारोह में उन्हें मेडल, डिप्लोमा और लगभग 11.5 करोड़ रुपए की पुरस्कार राशि से सम्मानित किया जाएगा। (खास बात यह है कि नोबेल के बाकी पुरस्कार स्वीडन में दिए जाते हैं, लेकिन शांति का नोबेल अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार लगभग 130 साल पुरानी परंपरा के तहत नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में दिया जाता है।)

गन्ने के खेतों से उठी उम्मीद और दादा का संघर्ष
नवी पिल्लै की यह कामयाबी जितनी उनकी अपनी है, उतनी ही उनके पुरखों के संघर्षों की भी है। उनका जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था। उनका परिवार भारतीय तमिल मूल से ताल्लुक रखता है। उनके दादा 1890 के दशक में भारत से बंधुआ मजदूर बनकर दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे, जहाँ उन्होंने चीनी के बागानों में अमानवीय परिस्थितियों में काम किया।

उनका शुरुआती जीवन नस्लीय भेदभाव और कड़े संघर्षों के बीच बीता। उन्होंने डरबन विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की—1963 में ग्रेजुएशन और 1965 में लॉ की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका की मशहूर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर और डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

रंगभेद के दौर में खुद की लॉ फर्म खोलने वाली पहली महिला
शिक्षा पूरी करने के बाद जब पिल्लै ने 1967 में नेटाल प्रांत में अपनी लॉ फर्म शुरू करनी चाही, तो रंगभेद के उस काले दौर में कोई भी स्थापित फर्म उन्हें नौकरी देने को तैयार नहीं थी। लेकिन हार मानना उनके स्वभाव में नहीं था। उन्होंने अपनी खुद की लॉ फर्म खोली और वकालत शुरू की। ऐसा करने वाली वह दक्षिण अफ्रीका की पहली अश्वेत महिला बनीं।

नेल्सन मंडेला के कैदियों वाले हक की लड़ाई
पिल्लै के करियर का एक सबसे बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ साल 1973 में आया, जब उन्होंने अदालत में एक याचिका दायर कर रॉबेन आइलैंड जेल में बंद राजनीतिक कैदियों को वकीलों की मदद लेने का कानूनी अधिकार दिलाया। इन कैदियों में दक्षिण अफ्रीका के महान नायक नेल्सन मंडेला भी शामिल थे। हालांकि एक कैदी के तौर पर उनकी कभी मंडेला से व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई, लेकिन उनके द्वारा लड़ी गई इस कानूनी लड़ाई ने इतिहास की धारा बदल दी।

जब 1995 में मंडेला देश के राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने नवी पिल्लै की काबिलियत को सम्मान देते हुए उन्हें दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में जज नियुक्त करने की सिफारिश की। इस पद पर पहुंचने वाली वह पहली गैर-श्वेत महिला थीं।

रवांडा नरसंहार के दोषियों को सजा और वैश्विक पहचान
पिल्लै के करियर का सबसे कड़ा इम्तिहान और महत्वपूर्ण पड़ाव रवांडा नरसंहार से जुड़े मामलों की सुनवाई रहा। 1994 में रवांडा में तुत्सी समुदाय के लोगों का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ था। संयुक्त राष्ट्र ने 1995 में इसके अपराधियों को सजा दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण बनाया, जिसमें पिल्लै को न्यायाधीश नियुक्त किया गया। उन्होंने 1999 से 2003 तक इसकी अध्यक्ष के रूप में भी सेवा दी और यह साबित कर दिया कि न्याय की ताकत जुल्म की ताकत से हमेशा बड़ी होती है। 2026 का यह नोबेल शांति पुरस्कार केवल नवी पिल्लै की व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि यह उन तमाम लोगों के संघर्षों की वैश्विक मान्यता है जो सरहदों और नस्लों से परे जाकर मानवता और न्याय के लिए लड़ते हैं।

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