सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब, अदालत में वकीलों के बीच हुई तीखी बहस
चीफ जस्टिस समेत तीन जजों ने की सुनवाई

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने या उन्हें काम करने से रोकने का अंतरिम आदेश देने से साफ इनकार कर दिया है।
उन पर एसआईआर (SIR) से जुड़े करीब 14 फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना अकेले लेने का गंभीर आरोप है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इन सभी आरोपों पर चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है और स्पष्ट किया है कि यदि फैसले बिना सहमति के लिए गए पाए जाते हैं, तो उन्हें रद्द किया जा सकता है।

यह सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने हुई। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू व डॉ. विवेक जोशी, डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और डीजी (आईटी) सीमा खन्ना को नोटिस जारी किया है।
अदालत में वकीलों की तीखी बहस
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा कि 2023 के नए कानून के बाद से चुनाव आयोग की शक्तियां और काम करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। उन्होंने दावा किया कि नए कानून के तहत CEC और चुनाव आयुक्तों को इतनी कानूनी सुरक्षा (Legal Protection) दे दी गई है, जो प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के जजों के पास भी नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग में जिम्मेदारियों का बंटवारा और फैसले सर्वसम्मति से होने चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि तुरंत अंतरिम आदेश देकर CEC को नहीं रोका गया, तो देश के लोकतंत्र के लिए यह गंभीर स्थिति होगी।
इस पर जस्टिस बागची ने सवाल किया कि ऐसी स्थिति में चुनाव कौन कराएगा?

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने भी अपनी दलील रखते हुए कहा कि एक ऐसे कानून के जरिए गलत कामों को सुरक्षा दी जा रही है, जो संविधान के खिलाफ है। उन्होंने दिल्ली में एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया और फॉर्म-6 में जोड़ी गई नई शर्तों पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे माहौल में चुनाव आयोग की निष्पक्षता संदिग्ध नजर आ रही है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां और निर्देश
सर्वसम्मति बनाम बहुमत: CJI सूर्यकांत ने कहा कि आयोग से हमेशा यह उम्मीद की जाती है कि वे फैसले सर्वसम्मति से लें, लेकिन यदि सहमति नहीं बनती है, तो नियमों के तहत बहुमत से भी फैसले लिए जा सकते हैं। अदालत ने कहा कि फिलहाल यह सब एक खबर के आधार पर उठाया गया मामला है।
कानून का पालन अनिवार्य: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि देश में कानून बना हुआ है और सभी को उसका पालन करना होगा। यदि कानून का उल्लंघन हुआ है, तो अदालत निश्चित रूप से कड़ी कार्रवाई करेगी।
रिकॉर्ड देखने के बाद ही फैसला: बेंच के जजों ने कहा कि यदि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि कोई फैसला सर्वसम्मति से नहीं लिया गया था, तो अदालत उस पर रोक लगा सकती है और उसे कानून के दायरे से बाहर घोषित कर सकती है। लेकिन बिना पुख्ता रिकॉर्ड देखे यह मान लेना सही नहीं होगा कि सारे फैसले अकेले लिए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस संवेदनशील मामले में सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है।






