रूसी हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए यूक्रेन की लड़कियों ने थामी बंदूक

नई दिल्ली। यूक्रेन पर रूसी हमले के मंडराते खतरों के बीच वहां की महिलाओं ने हथियार उठा लिए हैं। अलग-अलग पेशे से जुड़ी महिलाएं शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग लेकर देश की रक्षा के लिए सेना में भर्ती हो रही हैं। इन्हें बंदूक चलाने से लेकर फर्स्ट एड और सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दी जा रही है। ज्यादातर महिलाएं अपना काम, घर-परिवार और बच्चों को छोड़कर आईं हैं।

गंभीर हालात देखते हुए यूक्रेन सरकार ने 20 से लेकर 60 साल तक की महिलाओं को सेना में शामिल करने का निर्णय लिया है। 30 हजार से ज्यादा महिलाएं यूक्रेन की सेना में पहले से शामिल हैं। यूक्रेन की सेना में 1993 से ही महिलाएं शामिल हैं। इस दौरान उन्होंने युद्ध के मैदान में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर अपने देश की रक्षा की है। अभी यूक्रेन की सेना में करीब 31 हजार महिला सैनिक हैं। इनमें से 1100 सैन्य अफसर भी हैं। 13 हजार से अधिक महिला युद्ध क्षेत्रों में तैनात हैं। यूक्रेन के सैन्य बलों में महिलाओं की हिस्सेदारी 15% है।

एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 के बाद से यूक्रेन में महिला सैनिकों की संख्या दोगुनी हुई है। 2014 में ही रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया पर हमला करके उसे अपने कब्जे में ले लिया था। तब भी देश की महिला सैनिकों ने रूसी सेना का डटकर मुकाबला किया था। उस समय रूसी हमले में 14 हजार से ज्यादा यूक्रेनी सैनिक और नागरिक मारे गए थे। इनमें काफी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं।

रूस समर्थित अलगाववादी गुटों से ले रहीं लोहा

यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में रूस समर्थित अलगाववादियों का प्रभाव है। ये यूक्रेन से आजादी की वकालत करते हैं। रूस इन्हें हथियारों से मदद करता है। यूक्रेन का आरोप है कि इन अलगाववादियों के साथ रूसी सेना भी यूक्रेन से लड़ रही है, लेकिन रूस इन्हें स्वयंसेवक बताता है। इनका यूक्रेन के कई हिस्सों में अच्छा-खासा प्रभाव है। 2014 के क्रीमिया हमले के बाद से इनका मनोबल काफी बढ़ गया है। इन अलगाववादियों से लड़ने में भी यूक्रेन की महिलाएं अहम भूमिका निभा रही हैं। यहां अलगाववादी अक्सर हमला करते रहते हैं।

बाबुश्खा बटालियन यानी बुजुर्ग महिलाओं की फौज

अपने देश की रक्षा के लिए यूक्रेन की बूढ़ी महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। यहां ह्यबाबुश्खा बटालियनह्ण नाम का बूढ़ी महिलाओं का एक संगठन है। इसमें शामिल महिलाएं सेना को युद्ध के समय कई प्रकार से मदद करती हैं। 2014 के क्रीमिया हमले के समय इस समूह की बूढ़ी महिलाओं ने अपने सैनिकों के लिए खंदक खोदे थे। बाबुश्खा की महिलाएं सैन्य आपूर्ती, चिकित्सा सेवाएं और खुफिया तंत्र के लिए भी काम कर रही हैं।