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सिंधिया और पवैया, राजवंश से सियासी अदावत और अब दोस्ती का ये अलहदा अंदाज

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ग्वालियर। राजनीति में राजनेताओं के मतभेद और मनभेद के बातें तो काफी आम है। चुनावी अखाड़े में जब नेता उतरते हैं तो आरोप-प्रत्यारोप का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। राजनीति के रसूखदार जब सियासी बिसात पर ताल ठोकते हैं तो अपने प्रतिद्वंदी पर वार करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। सियासी अदावत की कुछ ऐसी ही कहानी चंबल इलाके के कद्दावर नेता जयभानसिंह पवैया और महल से राजनीति करने वाले सिंधिया राजवंश की है। दोनों के बीच शह-मात का खेल लंबे समय तक जारी रहा, लेकिन जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दल बदलकर पवैया से मुलाकात की तो दोनों के दिल मिलने में देर नहीं लगी. आज हम बात कर रहे हैं जयभानसिंह पवैया और सिंधिया राजघराने की राजनीतिक रंजिश और उसके बाद हुए मेलमिलाप की।

महल को कड़ी टक्कर दे चुके हैं पवैया

सियासत में जब अदावत होती है तो यह शून्य से शुरू होकर सत्ता के शिखर तक जाती है। तल्खी जब होती है तो आरोप-प्रत्यारोप का दायरा पीढ़ियों की जंग में भी बदल जाता है। सियासी तकरार जब होती है तो राजनीतिक अस्तित्व को मिटाने की कस्मे खाई जाती है, हार-जीत की सिर्फ रस्में ही नहीं निभाई जाती है, बल्कि शह-मात का खेल सियासत की बिसात पर बड़ी शिद्दत के साथ खेला जाता है। कुछ ऐसी ही राजनीतिक रंजिश की दिलचस्प कहानी है भारतीय जनता पार्टी में चंबल इलाके के कद्दावर नेता जयभान सिंह पवैया और इस इलाके में सियासी रसूख रखने वाले सिधिया राजघराने की।

सिंधिया राजधराने से रही है अदावत

लंबे समय तक चले सियासी मतभेद के बाद जब ज्योतिरादित्य सिंधिया और जयभान सिंह पवैया की मुलाकात हुई तो यह कहा गय़ा की सियासी अदावत खत्म होने के साथ एक नया समीकरण चंबल के इलाके से उभरकर प्रदेश के साथ देश की सियासत पर छा गय़ा। रिश्तों पर जमी बर्फ जब पिघली तो नई सुबह का आगाज हो गया। क्योंकि जयभान सिंह पवैया एक ऐसे नेता हैं जो लंबे समय से महल की राजनीति को अपने दमखम से चुनौती देते आ रहे थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि भाजपा और संघ ने भले ही उनको स्वीकार कर लिया है, लेकिन उनके घर में उनका विरोध बरकरार है, क्योंकि जयभान सिंह पवैया ने सिंधिया के भगवाकरण को दिल से स्वीकार नहीं किया था।

माधवराव सिंधिया को दे चुके हैं चुनौती

सिंधिया राजघराना और जयभान सिंह पवैया की राजनीतिक रंजिश का इतिहास काफी पुराना रहा है। 1998 के चुनाव में माधवराव सिंधिया के खिलाफ वो खड़े हुए थे और माधव राव सिंधिया काफी जद्दोजहद के बाद सिर्फ 28 हजार वोटों से जीत दर्ज करवा पाए थे। सिंधिया जीत गए, लेकिन इस जीत से उनकी पेशानी पर बल जरूर आ गया, क्योंकि पहली बार उनकी जीत की फासला इतना कम हुआ था और उनको दमदार चुनौती मिली थी। इसके बाद सिंधिया ने सीट बदल ली और गुना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने लगे। पवैया का सियासी अंदाज हमेशा से सामंतवाद के खिलाफ रहा। वे हमेशा महल पर चुन-चुनकर वार करते रहे।

गुना में ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी कड़ी टक्कर

भाजपा के शिखर पुरूष अटल बिहारी वाजपेयी भी ग्वालियर से माधवराव सिंधिया को कोई खास चुनौती नहीं दे पाए थे और करीब पौने दो लाख वोटों से पराजित हो गए थे, लेकिन जयभान सिंह पवैया की कट्टर हिंदुत्व की छवि, अक्खड़ मिजाज और जमीनी स्तर पर पकड़ ने माधव राव सिंधिया को पलायन के लिए मजबूर कर दिया था। 2004 का चुनाव पवैया ने ग्वालियर से लड़ा और धमाकेदार जीत दर्ज की। ग्वालियर में सिंधिया राजवंश की जड़ें हिलाने के बाद भी पवैया का मन नहीं भरा और अगले चुनाव में उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया को गुना से चुनौती पेश की। इस बार सिंधिया को कड़ी चुनौती मिली और लाखों वोटों से जीत दर्ज करवाने ज्योतिरादित्य की जीत का अंतर काफी कम हो गया।

हिंदूवादी छवि के राजनेता है जयभान सिंह पवैया

पवैया द्वारा पेश की गई चुनौती का असर 2019 के चुनाव में देखने को मिला और ज्योतिरादित्य सिंधिया के एक शिष्य के पी यादव ने भाजपा से चुनाव लड़कर उनको मात दे दी। लगातार 23 साल तक सियासी अदावत का यह दौर बदस्तूर जारी रहा। अपने सियासी बाणों से सिंधिया राजवंश को आहत करने वाले पवैया विरोध के हर मोर्चे पर अव्वल बने रहे। इस दौरान कभी दोनों दिग्गजों ने एक-दूसरे की दहलीज पर कदम नहीं रखा।

शिवराज सरकार में रह चुके हैं मंत्री

लंसे समय के अंतराल के बाद जब जयभान सिंह पवैया के पिता के निधन पर ज्योतिरादित्य सिंधिया शोक व्यक्त करने के लिए गए, तो दिलों में जमा गुबार पलभर में निकल गया। चंबल इलाके के दोनों सियासी दिग्गजों, जो कभी अलग-अलग राजनीतिक दलों में थे, के बीच लंबी बातचीत हुई। लंबे वार्तालाप के बाद दोनों एकसाथ कैमरे के सामने आए और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा ,’नया संबंध, एक नया रिश्ता, हम दोनों ने कायम की है…अतीत-अतीत होता है, वर्तमान में हम और पवैया जी दोनों कार्यकर्ता हैं’। इसके साथ ही सियासी रिश्तों का नया दौर शुरू हो गया और सड़क से सामंतवाद को मिलने वाली चुनौती का भी खात्मा हो गया।