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उज्जैन में है तंत्र का अदभुत मंदिर, प्रतिमा को लगता है विशेष भोग

कालभैरव को मदिरापान की परंपरा सदियों पुरानी है।

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उज्जैन। उज्जैन की गणना सात मोक्षपुरियों में की जाती है और इसको मंदिरों का शहर भी कहा जाता है। पौराणिक काल के इस नगर में बारह ज्योतिर्लिंगों में से तीसरे नंबर के महाकाल और बावन देवी शक्तिपीठों में एक देवी हरसिद्धी विराजमान है। इसके अलावा अनेकों देवी-देवताओं के विराजित होने का गौरव उज्जैन को मिला है। किंतु मोक्षपुरी उज्जैन में मदिरापान से तृ्प्त और प्रसन्न होने वाले कालभैरव की छटा अनोखी, रहस्यमयी और सबसे निराली है। हमारे खास कार्यक्रम धर्म की बात में आज हम बात करेंगे मदिरापान कर भक्तों को अभय का वरदान देने वाले देवता कालभैरव की…

कष्टों का निवारण करते हैं कालभैरव

धर्मशास्त्रों में भैरव महाराज की आराधना का बड़ा महत्व बतलाया गया है। शास्त्रोक्त मान्यता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाई हुई है। भैरव महाराज को शिव का गण और पार्वती का अनुचर माना गया है। भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है, किंतु उज्जैन में विराजित कालभैरव की प्रतिमा अत्यंत दुर्लभ, चमत्कारी और रहस्यों से भरपूर है। कालभैरव को उज्जैन का रक्षक और कष्टों का हरण करने वाला देवता माना जाता है।

समस्याओं का समाधान करते हैं कालभैरव

काल भैरव का प्राकट्य मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को प्रदोष काल में हुआ था और इनको शंकर का रुद्रावतार माना जाता है। कालभैरव का मंदिर उज्जैन शहर की एक विशिष्ठ पहचान है। सदियों से यह प्रतिमा बदलते वक्त की गवाह रही है और सदियों को बदलते हुए इसने देखा है। कालभैरव, महाकाल के शहर उज्जैन को सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। इसलिए विपदाओं से नाश और कष्टों के निवारण के लिए कालभैरव की आराधना की जाती है। कालभैरव की सबसे प्रमुख विशेषता प्रतिमा का मदिरापान करना है।

मदिरा का पात्र कुछ पलों में हो जाता है खाली

काल भैरव को मदिरा पिलाने का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु प्रतिमा को मदिरा का भोग लगाते हैं। जानकारों का कहना है कि यह एक तांत्रिक मंदिर है और तंत्र के अनुसार पहले यहां पर बलि देने का प्रावधान था। बलि के मांस के साथ कालभैरव को मदिरा का भोग लगाया जाता था। बलि की प्रथा तो बदलते वक्त के साथ बंद हो गई, लेकिन मदिरापान का सिलसिला अब भी जारी है।

करीब छह हजार साल पुराना है मंदिर

कालभैरव के अधरों से मदिरा का पात्र लगाते ही पात्र से कुछ ही पलों में मदिरा गायब हो जाती है। प्रतिमा रोजाना कई लीटर मदिरा का पान करती है और विशेष अवसरों पर मदिरा की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है। प्रतिमा के इस रहस्य को जानने की कोशिश भी की गई किंतु हरसंभव प्रयास करने के बावजूद इस रहस्य पर से परदा नहीं उठ पाया। मान्यता है कि कालभैरव का यह मंदिर करीब छह हजार साल पुराना है। यह वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर है इसलिए यहां पर बलि और मदिरा के चढ़ावे की प्रथा रही है।

पहले बलि की भी थी प्रथा

प्राचीन काल में इस मंदिर में केवल तांत्रिकों को प्रवेश की अनुमति थी। मंदिर तांत्रिक क्रियाओं का बड़ा केंद्र था। बाद में इस मंदिर को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। बलि प्रथा तो समय के साथ बंद हो गई, लेकिन मदिरा के प्रसाद का सिलसिला जारी है। मान्यता है कि कालभैरव महाराज की आराधना से कष्टों का नाश होता है और शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही मुकदमों से संबंधित समस्या का समाधान भी कालभैरव की आराधना से होता है। मंदिर में बारहो मास भक्तों का जमघट लगा रहता है।

देवालयों के प्रांगण में फल-फूल और प्रसाद की दुकानें भक्तों को मिलती है।, किंतु कालभैरव मंदिर के परिसर में चारों और देशी और विदेशी मदिरा की दुकाने सजी हुई दिखाई देती है। सस्ती से लेकर महंगी और उम्दा किस्म की शराब यहां पर चढ़ावे के लिए मिलती है। इन दुकानों से शराब खरीदकर भैरव भक्त कालभैरव को अर्पित करते हैं और अपने कष्टों के निवारण के साथ मनोकामना पूर्ण होने की कामना करते हैं।