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Pitru Paksha 2021: पितृकर्म में ‘कुतप काल’ और ‘गजच्छाया योग’ है सर्वश्रेष्ठ, जानिए इनके बारे में

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Pitru Paksha 2021: पितृ पक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्धकर्म किया जाता है। पितृकर्म करने के लिए समय का विशेष ख्याल रखना चाहिए। पितृपूजा के लिए शास्त्रों में एक विशेष समय का विधान बतलाया गया है। इस निर्धारित समयावधि में श्राद्ध और तर्पण करने से पितृ तृप्त होते हैं और परिजनों को सुख-समृद्धि के साथ आरोग्य का वरदान देते हैं।

धर्मशास्त्रों में है कुतप काल का उल्लेख

गरुड़ पुराण, वायु पुराण, मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण, मनु स्मृति आदि अनेक सनातन संस्कृति के धर्मग्रंथों में पितृकर्म का वर्णन किया गया है। देवकर्म के लिए ब्रह्म मुहूर्त और सू्र्योदय के समय को सर्वश्रेष्ठ बतलाया गया है, किंतु पितृकर्म के लिए एक विशेष समय ‘कुतप काल’ को श्रेष्ठ माना गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार कुतप काल में किए गए पितृकर्म से पितृ शीघ्र तृप्त हो जाते हैं। मान्यता है कि दिन का आठवां मुहूर्त कुतप काल (Kutap kaal) कहलाता है। कुतप काल का समय दिन में 11:36 से 12:24 तक होता है। कुतप काल में पितृगणों को तर्पण, दान और ब्राह्मण भोज का आयोजन कराना चाहिए।

पितृकर्म के लिए ‘गजच्छाया योग’ है सर्वश्रेष्ठ

पितृ अपना भोजन अग्नि के माध्यम से ग्रहण करते हैं। इसलिए पिृतों को तृप्त करने के लिए श्राद्धकर्म में अग्नि में भोज्य पदार्थों की आहुति दी जाती है जिसे धूप डालना कहते हैं। कुतप काल में दी गई धूप अक्षय फ़लदायी होती है। इसी तरह शास्त्रों के अनुसार गजच्छाया योग में श्राद्ध कर्म करने से अनन्त गुना फल की प्राप्ति होती है। हालांकि गजच्छाया योग कई वर्षों के बाद ही बनता है और इसमें किए गए श्राद्ध से पितरों के वंशज को अक्षय फल की प्राप्त होती है। गजच्छाया योग का सृजन तब है, जब सूर्य हस्त नक्षत्र पर हो और त्रयोदशी के दिन मघा नक्षत्र हो। यह योग पितृपक्ष में बनने पर अत्यंत शुभ फलदायी होता है।