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शास्त्रोक्त विधि से शयन करने से मिलते हैं ये लाभ, जानिए इसके विधान

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धर्म दर्शन। मानव जीवन में भोजन, पानी और शयन तीन बातों का अत्यधिक महत्व है। इन तीनों कार्चों से शरीर ऊर्जावान बन रहता है और इंसान की शारीरिक क्रियाए सुचारू रूप से चलती रहती है। सनातन संस्कृति के धर्मशास्त्रों में इन तीनों के शास्त्रोक्त नियम बतलाए गए हैं। इन नियमों का पालन करने से शरीर निरोगी बना रहता है और सुख-संपदा की प्राप्ति होती है। धर्मशास्त्रों में शयन के कुष विशेष नियम बतलाए गए हैं। इनका पालन मानव के लिए आवश्तक बतलाया गया है।

मनुस्मृति

सूने तथा निर्जन घर में अकेला नहीं शयन चाहिए। “देव मन्दिर” और श्मशान में भी नहीं शयन करना चाहिए। –

विष्णुस्मृति

किसी निद्रा में लीन मनुष्य को अचानक नहीं जगाना चाहिए।

देवीभागवत

स्वस्थ मनुष्य को आयुरक्षा हेतु ब्रह्ममुहुर्त में उठना चाहिए।

पद्मपुराण

बिल्कुल अंधेरे कमरे में शयन नहीं करना चाहिए।

अत्रिस्मृति

भीगे पैर शयन नहीं करना चाहिए। सूखे पैर सोने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

महाभारत

टूटी खाट पर तथा जूठे मुँह शयन नहीं करना चाहिए।

ब्रह्मवैवर्तपुराण

दिन में शयन नहीं करना चाहिए। इससे व्यक्ति रोगी होता है और आयु का शरण होता है, लेकिन ज्येष्ठ मास में दोपहर के समय 1 मुहूर्त (48 मिनट) के लिए शयन किया जा सकता है।

गौतमधर्मसूत्र

निर्वस्त्र शयन नहीं करना चाहिए।

इसी तरह धर्मशास्त्रों के अनुसार पूर्व की ओर सिर करके सोने से विद्या , पश्चिम की ओर सिर करके सोने से प्रबल चिन्ता, उत्तर की ओर सिर करके सोने से हानि और मृत्यु, और दक्षिण की ओर सिर करके सोने से धन और आयु की प्राप्ति होती है। सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घण्टे) के बाद ही शयन करना चाहिए। बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर है। हृदय पर हाथ रखकर, छत के पाट या बीम के नीचे और पांव पर पांव चढ़ाकर शयन नहीं करना चाहिए। सोते हुए पढ़ने से नेत्र ज्योति का क्षय होता है। ललाट पर तिलक लगाकर शयन नहीं करना चाहिए।