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Jagannath Rath Yatra 2021: भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में समाया है श्रीकृष्ण का यह अदभुत और विस्मयकारी रहस्य

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Jagannath Rath Yatra 2021: भगवान श्रीकृष्ण का संबंध जितना ब्रजभूमि और द्वारका से है उतना ही पवित्र नगरी जगन्नाथ पुरी से भी है। धरती के बैकुंठ इस महातीर्थ में श्रीकृष्ण चमत्कारी स्वरूप में विराजमान है और कई रहस्यों को अपने में समेटे हुए है। इस मंदिर से जुड़े हुए कई चमत्कार है, जिनका वर्णन पौराणिक शास्त्रों में किया गया है। जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ की काष्ठ से निर्मित प्रतिमा विद्यमान है, जिसके अंदर अद्भुत अलौकिक रहस्य समाया हुआ है।

भालका तीर्थ में किया था श्रीकृष्ण ने देह त्याग

मोक्ष नगरी पुरी में भगवान श्रीकृष्ण के मोक्ष का कथानक जुड़ा हुआ है। एक शास्त्रोक्त कथा के अनुसार मंदिर में स्थापित भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्वयं ब्रह्मा विराजमान हैं। भगवान श्रीकृष्ण का स्वर्गारोहण उस वक्त हुआ था जब वह प्रभास क्षेत्र के भालका तीर्थ में एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे। जरा नाम के एक भील के द्वारा शिकार के लिए छोड़ा गया एक जहरीला तीर उनके पैर के तलवे में लगा और उन्होंने धरती पर अपना अंतिम क्षण मानते हुए देहत्याग कर दिया।

दिल ने लिया था पिंड का रूप

पांडवों को जब श्रीकृष्ण के शरीर छोड़ने का पता चला तो उन्होंने शास्त्रोक्त विधान के साथ उनकी मृत देह को पंचतत्व में विलीन कर दिया। देह राख में बदल गई, किंतु लेकिन ब्रह्मा कृष्ण के नश्वर शरीर में विराजित थे इस कारण उनका दिल जलता ही रहा, तब ईश्वर के आदेशानुसार जलते हुए दिल को जल में प्रवाहित कर दिया गया और उस पिंड ने एक लट्ठे का रूप ले लिया।

जगन्नाथजी की मूति में स्थापित है दिल

यह लट्ठा बहते हुए अवंतिकापुरी के राजा इन्द्रद्युम्न को मिला। राजा इन्द्रद्युम्न ने इस श्रीकृष्ण के दिल रुपी पिंड को भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के अंदर स्थापित कर दिया। इस समय प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठित किया गया। श्रीकृष्ण का दिल आज भी भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में धड़कता है। इस पिंड को आज तक किसी ने नहीं देखा है। 12 या 19 साल में जब नवकलेवर के अवसर पर पुरानी मूर्तियों के स्थान पर नई मूर्तियों की स्थापना की जाती है।

उस समय नई मूर्ति में दिल को पुरानी मूर्ति से निकालकर रखा जाता है। दिल को स्थापित करने की इस परंपरा के अवसर पर पुजारी की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है और हाथों पर कपड़ा ढक दिया जाता है। इसलिए वे ना तो उस लट्ठे को देख पाए हैं और ना ही छूकर महसूस कर पाए हैं। बस इतना अहसास होता है कि लट्ठा काफी नर्म होता है और वह दिल की तरह धड़कता है। यह मान्यता है कि इस पिंड को देखने से अनिष्ट होने की संभावना रहती है इसलिए इसको देखने की कोशिश आजतक किसी ने नहीं की है और प्राचीन समय से स्थापित परंपराओं और विधि-विधानों का पालन आज भी किया जाता है।