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Independence Day 2021: जब किताबों को फाड़कर और सोने की बग्घियों का सिक्का उछालकर भारत-पाक में बंटवारा किया था

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Independence Day 2021: मजहबी जुनून, सत्ता पर कायम होने का नशा और फिरंगियों की फितरती चालों में लिपटे षडयंत्र की वजह से 14 अगस्त 1947 को एक नया मुल्क अस्तित्व में आया। सरहदों के जरिए दिलों को बांटने की जिम्मेदारी एक फिरंगी रेडक्लिफ को दी गई और उन्होंने हिंदुस्तान की सरजमी को दो भागों में बांटकर दिलों के बीच मजहब, फिरके, संस्कृति और संस्कारों की लकीर खींच दी। इसके बाद सामान के बंटवारे की बारी आई और तयशुदा मापदंडों के मुताबिक काम शुरू हुआ और जुबानी जंग से लेकर तल्खी तक हर तरह के हथकंडे अपनाए गए।

धन संपत्ति का हुआ बंटवारा

देश के बंटवारे में सिर्फ 73 दिन बाकी थे। लॉर्ड माउंटबैटन ने रोजमर्रा के कामकाज के लिए एक कैलेंडर दिल्ली के हर सरकारी दफ्तर में चस्पा कर दिया था, ताकि काम की समयसीमा और उसकी संजीदगी का खास ख्याल रहे। दिल्ली में दो शख्सियतों को धन संपत्ति के बंटवारे, उसके नियमों और शर्तों को तय करने का जिम्मा सौंपा गया। इसमें भारत के प्रतिनिधि एच. एम. पटेल और पाकिस्तान की ओर से पैरोकार थे चौधरी मोहम्मद अली। जून से लेकर अगस्त के महीने तक दोनों धन-दौलत से लेकर किताबों और कागजों के टुकड़ों के बंटवारे के लिए झगड़ते रहे। दोनों विलायती सोच और अंग्रेजों द्वारा तय किए गए कायदे-कानून के साथ लालफीतों में बंधी फाइलों में दोनों देश का भविष्य तय करते रहे।

देश के नाम पर हुआ विवाद

बंटवारे के बाद सबसे पहला दावा देश के नाम पर किया गया। भारत नाम पर हिंदुस्तान ने दावा जताया और कहा कि अब मुल्क के दो टुकड़े हो चुके है इसलिए ‘भारत’ नाम पर अब भी भारत का अधिकार रहेगा। इस पर भी आपत्ति जताते हुआ अड़ंगा लगाया गया, लेकिन आखिरकर इस प्रस्ताव को ना-नुकूर करते हुए मान लिया गया।

बंद कमरे में हुआ फैसला

दिक्कत उस वक्त हुई जब धन-संपत्ति, कर्ज, नागालैंड जैसी छोटी जगहों में किसी सरकारी कार्यालय में रखी हुई संदूक और डाक टिकटों के बटवारे पर बात होने लगी। दोनों के बीच नोक-झोंक इस हद तक हुई की बीच-बचाव करना पड़ा और नौबत यहां तक आ गई कि एच. एम. पटेल और मुहम्मद अली दोनों को सरदार पटेल के घर में बंद कर दिया और कह दिया कि जब तक सभी विवाद सुलझ न जाए, तब तक उनको वहीं रहना पड़ेगा।

मयखाना आया भारत के हिस्से में

समझौते की शर्तों के मुताबिक, बैंकों में मौजूद धन-दौलत का 82.5 फीसदी हिस्सा हिंदुस्तान को और 17.5 फीसदी हिस्सा पाकिस्तान को मिला। चल संपत्ति का 80 फीसदी भारत को और 20 फीसदी पाकिस्तान के हिस्से में गया। । सामान के बंटवारे के दौरान सिर्फ वाद-विवाद ही नहीं हुआ बल्कि लड़ाइयां भी हुईं। अच्छे टाइपराइटर कहीं छुपा दिए गए। अच्छे मेज-कूर्सियों को बदल दिया गया। छतरी के स्टैंड से लेकर कलमदान तक के लिए दोनों देशों के प्रतिनिधि जूझते रहे। सिर्फ एक चीज ऐसी थी जिसको लेकर न जूतम-पैजार हुआ न कोई दिक्कत हुई। शराब पूरी भारत को बगैर ना नुकूर के सौंप दी गई लेकिन शराब के बदले में पाकिस्तान के खाते में कुछ रकम डाल दी गई।

शब्दकोश को फाड़कर हुआ फैसला

सबसे ज्यादा बवाल लाइब्रेरियों की किताबों को लेकर हुआ। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका का एक हिस्सा भारत तो दूसरा पाकिस्तान को और तीसरा फिर भारत को मिल गया, लेकिन जब शब्दकोश की बारी आई तो उसको फाड़कर दो हिस्सों में बाट दिया गया।

हिंदुस्तानी नोट चले पाकिस्तान में

कुछ चीजें ऐसी भी थी जिनको भारत ने पाकिस्तान को देने से साफ इंकार कर दिया। गृह विभाग में मौजूद गुप्तचर विभाग के अफसरों ने स्पष्ट कर दिया कि उनके विभाग की एक भी फाइल तो दूर दवात भी नए मुल्क को नहीं दी जाएगी। भारत ने नए देश के साथ सरकारी प्रेस को साझा करने से साफ इंकार कर दिया। लिहाजा दबंगई के बलबूते बने मुल्क को हिंदुस्तानी नोट पर पाकिस्तानी मुहर लगाकर काम चलाना पड़ा।

सिक्के की खनक से हुआ बग्घियों का फैसला

वाइसराय की शानौ- शौकत और शाही रुतबे को दिखाने वाली सुनहरी और सफेद रेलगाड़ी भारत के हिस्से में आई तो भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ और पाकिस्तान के गर्वनर की निजी गाड़ियां पाकिस्तान को मिल गई। सबसे दिलचस्प वाकिया वायसराय भवन के अस्तबल को लेकर हुआ। अस्तबल में बारह घोड़ागाड़ियां यानी बग्घियां रखी हुई थीं। इन बग्घियों में गद्दों पर जरी की महीन कारिगरी के साथ उम्दा बेल्जियम ग्लास की सजावट की गई थी। इसमें औपनिवेशिक काल के अक्स के साथ हिंदुस्तानी रजवाड़ों की शानौशौकत की झलक भी दिखलाई देती थी। इन बग्घियों में छह सुनहरी थी और छह रुपहली थी और दोनों देशों की निगाहें इन पर लगी हुई थी। इस पर माउंटबेटन के ए.डी.सी. लेफ्टिनेंट कमांडर पीटर होज ने कहा कि सिक्का उछालकर इस बात का फैसला कर लिया जाए कि किस मुल्क को घोड़ागाड़ियों का कौन-सा सेट मिलेगा। उस समय पाकिस्तान के कमांडर-मेजर याकूब खां और वायसराय के बॉडीगार्ड के कमांडर-मेजर गोविंदसिंह वहीं खड़े हुए थे। सिक्का उछाला गया खनन्न करते हुए जब जमीन पर गिरा तो मेजर गोविंदसिंह खुश होकर जोर से चिल्लाए सुनहरी गाड़ियां, जो सोने-चांदी जड़ित थी भारत को मिल गई थी।