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कैसे हुआ यूक्रेन का जन्म ? काल के गर्भ में किसने बोया था यूक्रेन की तबाही का बीज ?

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पूरी दुनिया का ध्यान इस समय रूस और यूक्रेन की जंग पर हैं। इस जंग ने पूरी दुनिया को एक खतरनाट मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। इसका नतीजा के होगा यह जानने से पहले यह जानना जरुरी है कि आखिर यूक्रेन की जड़ें कहाँ निकली हैं ? रूस और यूक्रेन का रिश्ता और इस रिश्ते की बुनियाद किसपर टिकी है ? आज इन दोनों देशों में जो कलह की स्थिति बनी हुई उसका जन्म कैसे हुआ या यूँ कहें कि यूक्रेन का जन्म कैसे हुआ ?

तो आईये थोड़ा अतीत में चलते हैं, नौवीं सदी में। यह कहानी कीव से शुरू होती है। वही स्लाविक साम्राज्य की प्रथम राजधानी थी। इसका गठन एक कबीले ने किया था जिसका नाम है स्कैंडिनेवियन कबीला। वे इसे रूस कहते थे। और यही आगे चलकर कीएवियन रूस कहलाया। और इसी महान साम्राज्य से जन्मा है रूस और यूक्रेन।

इस साम्राज्य में ओर्थोडॉक्स क्रिश्चियन धर्म का बोलबाला था। साल 988 में कीएव सम्राट व्लादिमीर प्रथम या सेंट व्लादिमीर स्वयातोस्लाविच द ग्रेट ने इस मत को अपनाया था। व्लादिमीर प्रथम ने मध्यकालीन रूस राज्य का विस्तार मौजूदा बेलारूस, रूस और यूक्रेन से लेकर बालटिक सागर तक किया। इस समय बेलारूसी, यूक्रेनी और रूसी भाषाएं यहाँ की मुख्या भाषाएँ थी। ये साझी विरासत इन तीनों देशों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ती है। हाल ही में पुतिन ने घोषणा भी की थी कि रूसी और यूक्रेनी लोग एक हैं।

खैर जानकार इससे सहमत नहीं हुए। उनका कहना है बेशक दोनों देशों की उत्पत्ति एक ही राज्य से हुई लेकिन यूक्रेन का अनुभव रूस से अलग रहा क्यूंकि अलग अलग समय पर कई ककतों ने यूक्रेन के तकदीर का फैसला किया। अब कहानी को आएगी बढ़ाते हैं तो पता चला कि 13 वीं सदी में रूस राज्य के कई सूबों पर मंगोल साम्राज्य का कब्ज़ा हो गया। लेकिन 14 वीं सदी में कमज़ोर होते मंगोल राज का फ़ायदा मॉस्को और लिथुएनिया नाम की दो सूबों को हुआ। और इन दोनों ने रूस को आपस में बांट लिया। कीएव और इसके आस-पास के क्षेत्र पर लिथुएनिया सूबे का कब्ज़ा हुआ और यही लोग यहां रेनेसां और सुधारवादी विचारधारा का बीज बो दिए।

पश्चिमी यूक्रेन के एंड गैलिसिया या कारपेथिन गैलिसिया क्षेत्र पर हैब्सबर्ग साम्राज्य का राज रहा। उस इलाके में अब भी उस काल की सांस्कृतिक विरासत देखी जा सकती है। पश्चिमी यूक्रेन में कई लोग रशियन ऑर्थोडॉक्स चर्च के अनुयायी नहीं है। वे ईस्टर्न कैथोलिक चर्च को मानने वाले हैं. ये मत पोप को अपना अध्यात्मिक गुरु मानती है।

17 वीं सदी में लिथुएनिया-पोलैंड के राष्ट्रमंडल और रूस के ज़ार सम्राटों के बीच एक युद्ध हुआ नतीजा यह रहा कि डनाइपर नदी के पूर्व के सारे इलाक़े रूस नियंत्रण में चले गए। यूक्रेन के लोग इस क्षेत्र को अपना ‘बायां किनारा’ मानते थे। मौजूदा यूक्रेन जहां हैं, उसके मध्य और उत्तर पश्चिमी इलाके में 17वीं शताब्दी में एक राज्य था, जिसे साल 1764 में रूस की साम्राज्ञी कैथरीन द ग्रेट ने विलय कर लिया। उन्होंने पोलैंड के अधिकार वाले यूक्रेन के इलाक़े पर भी अधिकार हासिल कर लिया। आने वाले सालों में एक नीतिगत आदेश के तहत यूक्रेन की भाषा के उपयोग और अध्ययन पर रोक लगा दी गई। आस्था को लेकर भी लोगों पर दबाव बनाया गया और इस तरह एक ‘छोटी जातीय’ समूह की रचना कर दी गई। और यही वजह बनी भविष्य के कलह की।

इसी बीच पश्चिम के कई देशों में राष्ट्रवाद की लहर चली. इसका असर पोलैंड से लेकर ऑस्ट्रिया तक नज़र आया. इस दौरान यहां कई लोगों ने रूस के लोगों से अलग दिखाई देने के लिए ख़ुद को ‘यूक्रेनी’ बताना शुरू कर दिया। लेकिन, 20 वीं सदी में रूस की क्रांति हुई और सोवियत संघ का गठन हुआ। और यहीं से ‘यूक्रेन से जुड़ी पहेली’ को एक नई शक्ल मिली। सोवियत नेता जोसेफ़ स्टालिन ने दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति पर पोलैंड से पश्चिमी यूक्रेन का अधिकार हासिल कर लिया।


1950 के दशक में मॉस्को ने क्राइमिया को यूक्रेन के हवाले कर दिया। ये सोवियत संघ का ही हिस्सा था। सोवियत सरकार ने यूक्रेन पर और ज़ोरदारी के साथ रूस का प्रभाव थोपने की कोशिश की। कई बार यूक्रेन को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही थी। 1930 के दशक में सोवियत संघ का हिस्सा रहे यूक्रेन के लाखों लोग स्टालिन की ओर से जबरन थोपे गए अकाल की वजह से मारे गए। इसके बाद स्टालिन ने वहां बड़ी संख्या में सोवियत लोगों को बसाया।

इनमें से कई यूक्रेनी भाषा नहीं बोल पाते थे। दरअसल बात यह है कि सांस्कृति रूप से सोवियत संघ कभी यूक्रेन पर आधिपत्य साबित नहीं कर सका। यूक्रेन पर आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य फ़ैसले भले ही थोपे जाते थे लेकिन सांस्कृतिक और शिक्षा के क्षेत्र में यूक्रेन के पास एक ‘ख़ास स्वायत्तता’ थी। दबदबा भले ही रूसी भाषा का था लेकिन प्राइमरी स्कूल में बच्चे यूक्रेनी भाषा सीखते रहे। और आनेवाले समय में यूक्रेनी भाषा में बहुत किताबें छपी। और यहीं किताबें एक मजबूत मजबूत राष्ट्रवादी अभियान की पहल बनी। बात 1991 की है। सोवियत संघ बिखर गया और 1997 में रूस और यूक्रेन के बीच संधि हुई। इसके जरिए यूक्रेन की सीमाएं तय हुई। लेकिन देश के अलग-अलग इलाकों में कुछ ऐसी खामियां रह गईं जिससे दरारें बनी रही हैं। और इन्ही दरारों की अँधेरी दुनिया में प्रतिशोध की वो चिनगारी जल रही थी, जो संकेत दे रहा था भविष्य की तबाही से भरे महायुद्ध की।